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मेरे महबूब

मेरे महबूब

अब सवाल उठे महबूब तो दफ़नाए कैसे? ये चिंगारियां बुझाए कैसे? तुम जहां मेरे, जहां से खुद को बचाए कैसे? सब कुछ जानकर भी जान से जान छुड़ाएं कैसे?

मेरे महबूब, तू मेरे ख्वाबों में आना छोड़ दे, यूँ तन्हाइयों में मुझे वापस मोड़ दे, यह अंधेरा पुराना आशिक है मेरा,  फिर मोहब्बत हो रही मुझे इससे, अब इस से ही मोहब्बत रहने दे, तू सारे नाते तोड़ दे।

मेरे महबूब, यों बार-बार यादों में मत आया कर, यूं चेहरे मत छुपाया कर, तुम जाने वाले थे तो आखिर गए क्यों नहीं अभी पूरी तलक, मैं पागल हूं, मेरे हश्र् पर झूठे आंसू मत बहाया कर।

मेरे महबूब, मैं शायर नहीं बनना चाहता, मैं  मोहब्बत में ताउम्र नहीं जलना चाहता, सरसरी रूप में मैं नहीं भाया तुझे, तेरे अतीत को नहीं जान पाया कभी मैं, मैं इंतजार कर रहा भले ही तू छोड़ गया, पर मैं पल-पल इंतजार में नहीं मरना चाहता।

मेरे महबूब, बता मुझे क्या कमी थी मोहब्बत में मेरी? आखिर बहुत कुछ हुआ, एकाएक तू नहीं निकाला यूँ लताड़ कर तुमने भी, बहुत बातें हैं जो हिज्र से जुड़ी तड़पाती हैं, मेरे महबूब, क्या सही है यह दोष मेरा तुम पर मढ़ना?

लोगों से सुना कि तुम सही नहीं हो, देखा, तुम इतने भी सही नहीं हो, पर यूँ जो अटक गई है यह उंगलियां तुम्हारी बालों में मेरी, अब यूँ दिल का क्या ही कीजै?अब यूँ ना मय्यसर मौत का क्या ही कीजै?

अरसा बीत चुका है यादों को- बातों को, पर यूँ दर्द का क्या ही कीजै? देखी महबूब की हँसती तस्वीर, अच्छा लगा, अच्छा लगा, जलन हुई, दिल एकाएक टूटा फिर से, आंसू निकले फिर से, शरीर थम गया फिर से, दिमाग बौखला गया फिर से, पर महबूब की तस्वीर में महबूब हँस रहा था, देख कर अच्छा लगा।

बहुत अजीब है तेरा-मेरा मिलना, कुछ खास नहीं, कुछ आम नहीं, बहुत याद रह कर भी कुछ याद नहीं, मेरे महबूब, तड़प रहा हूं आज फिर, लेकिन तुम्हें पता चलेगा नहीं, क्योंकि…… पता नहीं क्यों? बस पता चलेगा नहीं, तुम्हें कभी।

मेरे महबूब, काश और शायद बहुत सारे हैं, सितारे टूटते बहुत सारे हैं, यूँ सवालात करना तनिक ठीक नहीं होगा, अब फर्क क्या की पसंद की बात थी भी या नहीं कभी,  यूँ सर-सरी रूप में खुद को रोकर खोना अब ठीक नहीं होगा।।

मेरे महबूब, क्या पसंद भी था तुझे मैं कभी, क्या यूं ही रहते तुम दुनियावी लोगों से दूर कभी। मुझे ग़म है जिंदगी भर के-मेरी मोहब्बत के नतीजे, यों छू जाना मेरे होठों को हमेशा दूर जाने के लिए ही कभी।।


~कौशल

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About The Author

Heerak Singh Kaushal

A person who is not afraid to 'call a spade, a spade'. You can often find me in two moods, either talking to everyone or just a quiet child. I live in a bubble that whatever it is shown in the newspapers, people are still good at heart. I wish you the best and may your pain just blow away!

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