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GOGO Magazine > Blog > Blog > अप्सराएं
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अप्सराएं

Heerak Singh Kaushal
Last updated: August 18, 2022 11:46 pm
Heerak Singh Kaushal Published May 29, 2020
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21 Min Read
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स्वर्ग लोक में अप्सराएं पाई जाती हैं। देवता भी पाए जाते हैं। कहा जाता है कि वहां पर पितृसत्ता है। इस पितृसत्ता को अप्सराएं वक्त वक्त पर तराजू पर तोलती आई है। इंसान में वासना का एक बहुत बड़ा महत्व होता है, वासना अर्थात काम, काम के देव, कामदेव। कहती है अपनी पितृसत्ता को वैधता दिलवाने के लिए वेश्याओं का गठन किया गया। वैधता के पैमाने ना कोई जान सका, ना जान पाया। कथित मनोवैज्ञानिक भी कोशिश ही कर सके, पर वैधता केवल एक ह्रदय की अनुभूति रही। यूँ तो वासना को समाज में बहुत ही गलत तरीके से देखा जाता है पर क्या वह मात्र इंसान की जरूरत को नहीं दर्शाती? जब-जब समाज किसी चीज को अपनाने से मना करता है तब उसे हाश्रिए पर धकेला जाता है जैसे कि नपुंसक या वे लोग जो कि किसी भी प्रकार से शारीरिक रूप से ठीक नहीं है या वे लोग जो मानसिक रूप से ठीक नहीं है, मूलभूत में स्त्रियां, गरीब बच्चे और वेश्याएं।

ठाकुर साहब गोरखपुर के गांव के राजा माने जाते थे। उनके दादा अंग्रेजों के समय में बहुत ऊंचे पदों पर काम कर चुके थे। कहते हैं कि जाते-जाते कोई अंग्रेज अफसर उनको छोटी सी सोने की तोप देकर गया था। 1947 के आंदोलन से बिल्कुल नाखुश थे। ऐसा भी नहीं कि वह सबके सामने कुछ भी बक देते थे। दिमागदार इंसान थे। जानते थे कि सबके सामने क्या कहना है और अकेले में क्या। ठाकुर साहब के पिता भी बहुत बड़े साहूकार थे। पूरे गांव में उनका डंका बजता था। ठाकुर साहब की तीन संताने थी, दो बेटी और एक लड़का। लड़का छोटा था। लड़का हुआ तो ठाकुर साहब ने पूरे गांव में मिठाईयाँ बाँटी। उनकी बड़ी बेटी की शादी हो चुकी थी। मंझलि का नाम था राप्ती, गोरखपुर में राप्ती नदी बहती है, जो गंगा में जाकर मिलती है। कहते हैं वह विशाल गंगा को विशालकाय बनाती है और उसे भी उतना ही पवित्र भी माना जाता है। उसके लिए भी उन्होंने एक वर ढूंढ रखा था। अपने तीनों बच्चों के लिए उन्होंने छोटे होते से ही रिश्ते ढूंढने चालू कर दिए थे और यह तय हुआ था कि जब बड़े हो जाएंगे तब उसी घर में उनकी शादी होगी। इससे उनके व्यापार में भी तेजी देखने को मिली थी। राहुल, राप्ती का छोटा भाई था।

राप्ती अभी 12वीं की परीक्षा दे रही थी। एक रोज़ गांव में हंगामा मच गया। वो स्कूल के पीछे वाले मकान में कमाल के साथ पाई गई। ठाकुर साहब का अहम चकनाचूर हो चुका था। उनका सर शर्म से झुक चुका था। वे जो किसी मुसलमान को रास्ते में देख लेते थे तो भी गंगा को अंजुली में भरते थे। आज उनकी ही बेटी एक मुसलमान के साथ स्कूल के पीछे पाई गई। वे ऐसे अपमान को बर्दाश्त करने वाले नहीं थे। उनका क्रोध चरम सीमा पर था। वे कुछ पहलवानों के साथ कमाल के घर जा पहुंचे। कमाल भागकर पुलिस थाने जा पहुंचा। पर ठाकुर साहब तो ठाकुर साहब थे। पुलिस वालों ने कमाल को हथकड़ी लगाई और ठाकुर साहब को सौंप दिया। हर वह व्यक्ति जिसने कमाल और राप्ती को साथ देखा था, ठाकुर साहब ने उन सब को बुलाया। उनसे पूछा कि इनको किस अवस्था में देखा? प्रत्येक का अपना अलग-अलग अंदाजा होता। एक ने कहा कि कमाल ने राप्ती की कमर पर हाथ रखा था। उसी क्षण एक पहलवान उठा और उसने जोर से कमाल की कमर पर पाँच लातें दे मारी। वह नीचे गिरा, लड़खड़ाया सा। दूसरे ने बताया की कमाल ने माथे को चूमा था, उसी क्षण कमाल के होठों पर चाकू फेर दिया गया। तीसरे ने बताया कि उसने कमाल को बालों में हाथ लगाते हुए देखा, पहलवान उठा और हाथ की हड्डियां तोड़ डाली। कमाल का मरना तय था। शुक्र है पहली रात को ही मर गया। उनके घर वालों को बता दिया गया कि कमाल की मौत हो चुकी है। जानकारी भी दी गई कि उसके पास सिर्फ दो ही दिन है गांव खाली करके जाने के लिए वरना उनके साथ भी वही हश्र होना था जो कमाल के साथ हुआ। वह कमाल का शव मांग रहे थे पर ठाकुर साहब ने मना कर दिया। शुक्र है वे डर गए और भाग खड़े हुए। कमाल के शव को राप्ती में फैंक दिया गया।

अब राप्ती की बारी थी। गांव की बातें फैल चुकी थी। अगले ही दिन राप्ती का रिश्ता भी टूट गया। ठाकुर साहब बहुत गुस्से में थे। लड़की बहुत ही गलत अवस्था में लोगों के सामने आई थी जिससे उनको शर्मसार होना पड़ा। वह अपनी बेटी को मारना चाहते थे, राप्ती को राप्ती में बहा देना चाहते थे ताकि खोया हुआ सम्मान पा सकें। मां जानती थी कि आगे क्या होने वाला है, उसने राहुल से वादा लिया और राप्ती को उसके साथ भगा दिया। राप्ती को बोला वापस ना आने के लिए और कहीं दूर जाकर बसने के लिए। कोई भी छोटा मोटा काम शुरू करने के लिए , पर वापस न आने के लिए। यदि वह वहां पर रहती तो उसकी भी मौत थी। राहुल का कार्य था यू.पी. से राप्ती को बाहर निकालने का।

राहुल पितृसत्ता की उपज थी। वह भी चाहता था कि राप्ती को मार दिया जाए, कम से कम उसे उसकी तो सजा मिलनी चाहिए जो उसने की। ‘हां, उसको उस चीज की सजा मिलेगी, भले ही वह दूर जा रही है तो क्या हुआ, उसने उन सब का जीवन नर्क कर दिया था, उसका भी जीवन अब खराब होना चाहिए।’ उसने राप्ती को बेच दिया, दिल्ली के एक दोस्त के पास, जो हमीदा बेगम के लिए काम करता था। हमीदा बेगम दिल्ली की एक बहुत बड़े कोठे की मालकिन थी। ₹5000 में राप्ती का निपटारा किया गया। ठाकुर साहब अचरज में थे कि राप्ती भागी तो भागी कहां। कहीं कोई ठिकाना ना मिला। अंत में ऐलान हो गया कि राप्ती भी मर चुकी है, ताकि बची कुछ इज्जत बनी रहे। घर में हवन हुआ और घर में गंगा की छींटे मारी गई।
हमीदा बेगम एक बहुत ही रौबीली औरत थी। उन्हें घायल शेरनी कहा जाता था। वह जो भी कहती पत्थर की लकीर होती। उनके यहां सिर्फ लड़कियां ही नहीं होती, पर तीसरे लिंग के भी थे और कुछ मर्द भी थे। राप्ती को अगले ही दिन साड़ी डालकर तैयार होने को बोला गया। लाली लगाई, चूड़ियां डलवाई गई। राप्ती का पहला ग्राहक था, पुलिस का एस.पी.। जब उसने एक पुलिस वाले को देखा तो बड़ी खुशी हुई। चलो उसको वहां से निकाला जाएगा पर….
पैसे का विभाजन को कुछ इस प्रकार होता था। हमीदा बेगम अपने पास 40% रखते और बाकी 60% जिसका शोषण होता उसको दे देती यह सोच कर खुश रहती कि वह अच्छा कार्य कर रही है।

हमीदा बेगम भले ही गलत काम करती पर उसे गलत मानती नहीं थी। अपनी जान के लिए जीना, अपने लिए जीना, अपने जिस्म को बेचकर अपनी मर्जी के साथ जीना, उसके लिए गलत नहीं था। समाज ने उसे इतना कुछ दिया नहीं था तो वह समाज की किसी बात के दायरे में भी नहीं आना चाहती थी। यही समाज के आल्हा अफसर उसकी खुशामद करते हैं।
बड़ी खुद्दार महिला थी। जिस पर उसको एतबार हो जाए मानो वह बहुत खास और जिस पर नहीं उसको वह सोने के लिए छज्जा देती थी। जब एस.पी. साहब चले गए थे तो राप्ती को उन्होंने अपने पास बुला कर दो टूक बात कही, ” देख लड़की, भागने की कोशिश तो मत करिए, पुलिस के पास जाएगी पुलिस तुझे वापिस यहां भेजेगी, फिर मैं तेरा हश्र करूंगी वह अलग। इससे बेहतर यही है कि तू आराम से यहां पर रह, अभी तेरी उम्र है 16 साल, 45 साल तक यहां पर आराम से काम कर, जितने तेरे पैसे बनते हैं बना और निकल।”
राप्ती को समझ नहीं आ रहा था ,इतनी बड़ी कैद 45 साल तक, वह एक-दो हफते तक रोती रही। कोई चुप नहीं करवाता था। सारे खुश दिखते। खुश कैसे हो सकते थे, कैद में जीते हुए।

पांचवे दिन में एक अन्य श्रेणी का व्यक्ति, गुंजन राप्ती के पास आता है। यह बताने के लिए कि कल महीने का तीसरा सोमवार है तो वे बाजार में जाकर कुछ खरीदारी करने वाले हैं। राप्ती चाहे तो साथ चल सकती है। बेगम को नहीं पसंद की उनकी कोई भी लड़की कोठे को मैयत बनाएं। राप्ती ने उससे सारी बात की, बहुत सवाल थे उसके मन में, जिसका उसे कहीं उत्तर नहीं मिल रहा था। गुंजन ने उसकी सारी बातों का जवाब दिया और हमीदा की कहानी बताइ, कहते हैं हमीदा की मां एक देवदासी थी जो कि एक मुस्लिम से प्रेम कर बैठी। उसके साथ भाग खड़ी हुई। पर वह अन्य स्त्री को भी साथ ले आया हमीदा की मां के सामने सौतन, उसे यह बात बर्दाश्त कैसे होती। उसने जब-जब आवाज उठाई तो उसे सुलगती हुई बीड़ी से जला दिया जाता, हर एक निशान बताता था कि वह कितनी बार बोली थी। हमीदा की मां गभ्र्र् से थी और शादी के चौथे महीने में ही हमीदा दुनिया में आई। हमीदा के पिता यह मानने को तैयार नहीं थे कि वो लड़की उनकी है। अभी शादी को केवल चार ही महीने हुए थे…पर मात्र शादी को।

हमीदा की मां को “तलाक तलाक तलाक” करके तलाक भी दे दिया गया। वह अपनी बेटी के साथ उसी मंदिर जा पहुंची जहां पर वह देवदासी होती थी। वहां पर भी उसे अपवित्र घोषित कर दिया गया। उसे कोई और व्यापार का नहीं पता था। पता था तो बस नृत्य का और पंडितों को खुश कैसे करना है। यहीं पर ही उसे उसकी ही तरह के समाज से मुलाकात करने का मौका मिला जिन्हें किन्नर कहते थे ,अब वह उनके साथ नाचती, लोगों के घर जाकर गाती। हमीदा की मां ने हमीदा से कभी भी अपना इतिहास छुपाना मुनासिब नहीं समझा। उसका हक था जानना कि वह कैसी है और किस की पैदाइश है। ना उसने कभी अपने ऊपर किसी भी प्रकार का घृणा का या फिर मलाल का भाव दिखने दीया। उसके हाथ में होता तो वह सब कुछ साधारण रखती। उसने हमीदा को एक अच्छे स्कूल में डाला। कहते हैं वहां पर हमीदा को बहुत तंग किया जाता था। उसे ताली मार मार कर उसका मजाक बनाया जाता था। हमीदा का ध्यान पढ़ाई में नहीं था। उसने अपनी मां को बहुत बार बताया पर माँ विवश थी, क्या करती, कुछ समय में वो टी.बी. के कारण मौत की शिकार हुई। हमीदा ने स्कूल छोड़ दिया और एक दर्जी की दुकान पर लग गई वहां पर कपड़े सिलने की कला को बखूबी जानने लगी, कस्बे में नाम भी होने लगा था। पर छोटे कुल की स्त्री इतनी विख्यात होने लगे तब कैसे हर एक को अच्छा लगता? बातें फैली कि यह मुसलमान और देवदासी की बेटी है, किन्नरों के साथ रहती है। उसकी दुकान को आग लगाने की चेष्टा की गई। समाज ने उसको समाज का हिस्सा बनने से रोक दिया, जैसे उसकी मां को रोका था। उसके बाद अब उसके पास एक ही विकल्प था, पुलिस के पास जाने का। वह पुलिस के पास गई और उस रात्रि पुलिस ने उसका अच्छे से उपयोग किया। वो जान चुकी थी कि समाज का कभी हिस्सा नहीं बन सकती।
हमीदा ने कहीं पढ़ा था कि चाणक्य ने चंद्रगुप्त के लिए एक गणिकाओं की फौज तैयार की थी, जो गुप्त रूप से उसके लिए कार्य करती थी। इसी वजह से चाणक्य, चंद्रगुप्त को भी राजा बना पाया और सेल्यूकस निकेटर को भी हरा पाया।

हमीदा अब समाज का हिस्सा तो नहीं बन सकती थी पर वह जानती थी कि उसे समाज को निचोड़ना कैसे है। अब हमीदा हमीदा ना रहकर गणिकाओं की रानी बन चुकी थी, जो भी टूटा हुआ व्यक्ति उसके पास आता, उसका अपना होता। पर उसकी शर्तों के अनुसार होता। हर एक पर वो ऐतबार नहीं करती थी और ना ही उसे करना चाहिए था। उसने अपने आप को दिल्ली में पाया, दिल्ली जहां पूरे राष्ट्र का केंद्र होता है, वहीं पर ही उसने अपने आपको आला अफसरों का केंद्र पाया जो वक्त वक्त पर अपनी वैधता के लिए उसके पास आते थे।

राप्ती ने जब कहानी सुनी तो वे दंग रह गई। वह जाकर मिलना चाहती थी हमीदा से, उसे गले लगाना चाहती थी वह 62 साल की औरत जो कि इतना सब कुछ सहन कर चुकी थी वो हमीदा…पर इसका अर्थ यह नहीं था कि वह अभी भी वह कार्य करना चाहती थी जो उससे करवाया जा रहा था। पर हमीदा की कुछ शर्ते थी और उन्हीं शर्तों पर कार्य करने के लिए वो तैयार रहती थी। यदि राप्ती भागती तो उसके साथ बहुत गलत होता। राप्ती सब कुछ जान चुकी थी। उसे धीरे-धीरे बात को मानना स्वीकार किया। हमीदा को राप्ती बहुत पसंद आई धीरे-धीरे राप्ती पर इतना ऐतबार हुआ की राप्ती को हमीदा की छोटी बहन कहा जाने लगा। 12वीं पास थी तो उसके सारा हिसाब किताब भी आता था। कमाल की बात थी कि एक ऐसी युवती जो कि जबरदस्ती बांधी गई थी अब वह वहीं की होकर रह गई, शायद उसने गुलामी में इतनी स्वतंत्रता पाई थी जो गए स्वतंत्र रहकर कभी नहीं पा सकी। राप्ती अपने नए जहान में खुश थी। जहां पर वह उन लोगों की रानी थी जो टूटे हुए थे। या उनको थोड़ा सा और तोड़ दिया जाता था ताकि वह ठीक रहे या फिर अगर वह ठीक थे तो पता नहीं क्या किया जाता था पर वह अंत में खुश थे मानो स्कूल का एक बच्चा हो जो बहुत ही जिद्दी हो और स्कूल की कोई बात ना मान रहा हो और अंत में वह बात मान जाए। वह सब खुश थे। धीरे-धीरे राप्ती को पता चला की हर कोई इतना ही अच्छा नहीं है जितना हमीदा बेगम है। बाकी जितने भी कोठों की मालकिन है वह वह अपनी गणिका ओं के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करते। लोग इतने भी अच्छे नहीं होते जितने वह अच्छी हैं। बहुत-बहुत अजीब दुनिया में वह अपने आपको पाती रही। हमीदा बेगम कमल थी जो शायद कीचड़ में खिल चुकी थी। सड़ा गला, दो चेहरों वाला समाज, वहां से टूटे हुए लोगों को निकाला जाता। वह समाज एक दलदल है। सारे टूटे हुए लोग एक कीचड़ का हिस्सा और उसी कीचड़ में एक खिला हुआ कमल थी हमीदा बेगम। बाकी सभी कीचड़ के कीचड़!

2014 के चुनाव में योगी आदित्यनाथ जी गोरखपुर से खड़े हुए और पता नहीं क्यों योगी आदित्यनाथ एकाएक ही राष्ट्र का चेहरा बन चुके थे। हर टीवी पर उनकी खबर और गोरखपुर शहर। गोरखपुर को देखकर राप्ती की आंखें नम सी हो गई। वह गोरखपुर जाना चाहती थी। पर हमीदा ने मना कर दिया। राप्ती हमीदा की कोई बात नहीं टालती थी और ना ही हमीदा राप्ती की। उसने सीधा जाकर पूछा कि क्या उसको अब भी उस पर इतना विश्वास नहीं है कि वह वापस आएगी या नहीं? हमिदा ने कुछ ना कहा।

हमीदा बूढ़ी हो चुकी थी वैसे तो पैसे के हिसाब से उसने राप्ती को 45 साल तक रखना था, पर उसे पता था कि यदि वह मर गई तब कोठे का जितना भी जिम्मा है वह श्यामा पहलवान के पास चला जाएगा और वह इस कोठे को बाकी कोठे की तरह बना देगा। राप्ती 36 साल की थी, हमीदा ने उसे आजाद किया अपने भी कुछ पैसे दिए और पास आने को बोला, अपने झूरियों वाले हाथों से पहली बार उसका माथा पकड़ा और चूमा और बताया कि उसे 2014 में उसे जाने से क्यों रोका, हमीदा का चेहरा खरा था, उसने बोला कि उसके भाई ने उसे सिर्फ बेचा नहीं पर यह भी शर्त रखी कि 5000 की जगह यदि 4000 भी दोगे तो भी चलेगा पर उसका पहला ग्राहक उसे बनने दिया जाए। हमीदा अपनों का दर्द जानती थी, उसने उसके भाई को पहलवानों से वहीं पर ही धक्के मार कर भगवा दिया।
राप्ती उस दिन खूब रोई ऐसा भी नहीं कि उसे कोई अपने भाई से उम्मीद थी, उसके लिए उसका भाई और उसके पिता उसी दिन ही मर चुके थे। पर यह कुछ अलग ही बात थी। अगले दिन हमीदा ने उसको कोठे से बाहर निकाल दिया, हमीदा को नहीं पता था कि वह कब अपनी आखिरी सांस लेगी, कहीं देर ना हो जाती। उसने जल्द से जल्द उसे निकाल दिया।
12वीं पास राप्ती एक अनाथालय के पास जा पहुंची, जहां पर उसने अपने सारे पैसे दे दिए, पैसे बहुत ज्यादा थे। अनाथालय वालों ने कहा कि इससे हम इन लोगों की कंप्यूटर लैब बनाएंगे उसके बाद बाहर दान देने वाले का नाम भी लिखा जाएगा, बताइए क्या नाम है? राप्ती ने चार पांच बार गहरी सांस ली और नाम बताया “हमीदा”।

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    June 13, 2020 at 8:28 pm

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