बरसों से किताबों में,
आशिकों ने वस्ल के मायने लिखे
हिज्र की रातें लिखी
मोहब्बत के अफसाने लिखे।
ये रस्म निभाते हुए,
मैं भी लिख देता हूं आज
तुम पर एक कविता!
अगर मैंने अपने प्रेम पर
कविता ना लिखी,
अपने महबूब को छोड़ दिया
जग के हवाले,
तो क्या मुझे कवि कहलाने का
हक है?
मैं कबूल करूंगा
अपनी इस कविता में कि
मुझे तुम चांद जैसी नहीं लगती
ना ही तुम्हारा चेहरा
मुझे सूरज की याद दिलाता है।
मुझे तो तुम,
एक नव विवाहिता के
माथे की बिंदी लगती हो,
तुम में क्षमता है
खुद से जोड़कर, लोगों को
नवजीवन देने की,
तुम इतिहास को नई कड़ी से
जोड़ने वाला एक द्वार हो।
मै तुम्हारा साथ कैसे मांगू,
मेरा ऐतबार करो
उस द्वार कि चौखटों पर मुझे
पहरा देने दो।

मैं अपनाऊंगा इस बात को कि
मैं तुम्हारी आंखो और मुस्कान का
भी कायल नहीं हूं।
तुम्हारे कभी ना थकने वाले हाथ,
तुम्हारे हमेशा चलते पैर,
तुम्हारा श्रम ही मुझे तुम्हारी ओर
खींचता है।
तुम मुझे किसी अभिनेत्री की याद नहीं दिलाती,
तुम तो मुझे मेरी मां जैसी लगती हो।
मैं कैसे ऋण चुकाऊं तुम्हारा?
बस मुझे इजाज़त दे दो
तुम्हें दो पल ज़मीन से उठाने की।

अगर अब मैं तुम्हें कहूं
की तुम शहद सी मीठी
जान पड़ती हो,
तो ये भी गलत होगा ।
तुम तो मीठे बेर भांति हो
जो भी तुम्हारा रस मांगता
तुम बस गिर जाती हो।
तुम प्रमाण हो
उस भटके हुए राहगीर का
जो अंधेरी रात में
खींचे पेट के साथ
तुम्हारे पास आया था।
क्या तुम्हें ऐतराज़ तो नहीं?
अगर मांग लूं मैं
वो राही होना?

एक और बात है
तुम कोई कविता भी नहीं हो,
तुम्हें लिखने बैठता हूं
तो सोचना पड़ता है!
जैसे सबसे खूबसूरत लब्ज़
एक लेखक अंत के लिए
संजो कर रखता है,
उसी पुरानी किताब की मुझे तुम
आख़िरी अनुच्छेद लगती हो।
बताओ
क्या तुम पढ़ने दोगी
वो अंतिम अल्फ़ाज़?

जब कवि लिखता है
कुछ बहुत खूबसूरत,
एहसास होता है अस्तित्व का,
तब वो अपने पड़ाव के
अन्तिम चरणों में होता है ।
बोलो
क्या तुम बनोगी मेरी आख़िरी रचना?

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