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GOGO Magazine > Blog > Blog > मुसहर
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मुसहर

Heerak Singh Kaushal
Last updated: August 18, 2022 11:43 pm
Heerak Singh Kaushal Published April 5, 2020
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7 Min Read
https://www.instagram.com/abhi_sheikh_chhilli
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झारखंड के गिरिडीह जिले के एक छोटे से गांव में इंसानों की एक प्रजाति पाई जाती है, जो दलित है।
दलित लोगों को प्रारंभिक काल से ही प्रताड़ना झेलने की आदत है और इस प्रजाति की खास बात यह है
कि यह प्रजाति मूस अर्थात् चूहा खाने को विवश होती थी। शुरुआत से ऐसा हुआ कि इस प्रजाति के पास
खाने के लिए कुछ नहीं होता था और क्योंकि जातिवाद था तभी करके इसको कुछ और भी नहीं दिया
जाता था। खाने को, पेट भरने के लिए कुछ ना कुछ तो करना ही था, तो इस निम्न वर्ग के जाति ने
अपना रहन बसन करने के लिए चूहे खाने शुरू कर दिया। उनमें से एक परिवार था रोनी का, जो एक 3
वर्ष की लड़की थी, माता घरेलू पर फिर भी लोगों के मल मूत्र साफ करने के लिए जाती थी और उस पर
दूर से ही पैसे फैंके जाते थे, कोई भी व्यक्ति मुसाहारी लोगों के पास आना पसंद नहीं करता था। एक
भाई था, गोआ, रंग चाय पत्ती के जैसा और थोड़ा कंकाल सा, भले ही घर में खाने के मोहताज थे, पर
थोड़ी अमीरों वाली बातें जरूर करता था।

यह भी देखने में आता था कि गांव में प्यार होता है पर वह प्यार तभी तक सीमित होता है जब तक
वह व्यक्ति उन गांव वाले जितना ही स्मृद्ध हो, जब गांव का एक व्यक्ति बाकी लोगों से थोड़ा ज्यादा
धनी हो जाता है तो ईर्ष्या और द्वेष आमतौर पर देखने को मिलती हैं। रोनी के घर में भी ऐसा ही था,
यदि उसके पिता पहले की तरह गांव में रहते तो शायद इतना कोई बवाल ना होता, पर क्योंकि उसके
पिता गांव के बाहर गाजियाबाद में रिक्शा चला रहे थे और थोड़ी बहुत ही घर की स्थिति बाकी लोगों से
बेहतर हो रही थी तो लोगों के मन में ईर्ष्या और द्वेष होने लगी थी, काफी बार यह भी देखने को आता
था कि गांव की सारी स्त्रियां मिलकर रोने की मां पर तंज कस रही होती।

कुछ समय बाद रोनी के पिता ने सोचा क्यों ना सारे परिवार को लेकर गाजियाबाद के एक छोटे से कस्बे
में ही रहना चालू कर दें। यही हुआ, गरीब लोगों के पास ज्यादा कुछ खोने और ढ़ोने को नहीं होता। गांव
की इस जाती के जितने भी लोग थे उन्होंने मिलकर विदा किया। देखा जाता है कि चाहे जितना मर्जी
कटुता हो जब कोई व्यक्ति आपसे दूर जा रहा होता तो आपको उसकी अच्छाई ही याद आती है। गांव की
सारी औरतों ने भी मिलकर रोनी की माँ के लिए, भाई के लिए और पिता के लिए कुछ ना कुछ लाया,
हाथ से बुने हुए ज़ेवरात जो कि कपड़े के थे, एक साड़ी, थोड़ी सी मिठाई और थोड़ा सा खाना ताकि रास्ते
में इनको कोई दिक्कत ना हो। रोनी की माँ जिन लोगों की बुराइयां करती फिरती थी, उन लोगों से ही
गले मिल-मिलकर गला फाड़ कर रो रही थी। शायद से इंसान वक्त वक्त पर भेस बदलकर अपने काम
को निकालना जानता है।

गाजियाबाद के एक आलीशान से बंगले के सामने तंबू था जो रोनी का नया घर था रोनी की मां की अब
पदोन्नति हो गई थी, अब वह सिर्फ बाथरूम नहीं, घर का भी काम करने लगी थी। झाड़ू, पोछा, खाना
बनाना जो मर्जी करवा लो। गाजियाबाद के लोगों में भी इतना शायद जाति को लेकर तवज्जो नहीं
था।कुछ साल बीते, रोनी बड़ी हो गई थी, उसका भाई पिता की ही तरह रिक्शा चलाने लगा ।
पूंजीवादिता इसमें इतनी बढ़ रही थी कि पता चला कि झारखंड वाले गांव को किसी मालिक ने हड़प

लिया है और मालिक कोई सरकारी बाबू है, चाह कर भी गांव वाले कुछ नहीं कर पाए और गांव वालों को
वहां से निकाल कर जंगलों में कर दिया गया। रोनी के पिता को जब यह बात पता चली तो वह गांव में
बात करने निकला लेकिन वापस नहीं आया।

अचानक से हर जगह मूस खाने वाली बात भी फैलने लगी, रोनी को स्कूल में सारे बच्चे ;मूस; कह कर
परेशान करने लगे जिस वजह से रोनी को स्कूल छोड़ना पड़ा, जैसे-जैसे बात और फैली,रोनी की मां को
भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा, शायद जन्मजात का धब्बा आपका पीछा नहीं छोड़ता। ऑटो के
सामने रिक्शा चालकों को भी कोई इतना नहीं पूछ थी, तो गरीबी का आलम दोबारा छा रहा था और
चूँकी सरकार को पार्क बनवाना था तो कुछ ही दिनों में उनके तंबू को हटाने के लिए भी कह दिया गया।
कहते हैं यदि किसी को ध्वस्त करना होता है तो मुसीबतें इकट्ठे ही आती हैं। अब उनके पास ना घर
था, ना पैसा, ना खाना और ना चूहा, तरह-तरह की रिपोर्टर्स रोनी के जैसे अनेक लोगों की फोटो खींच
कर उनसे बिना पूछे अखबारों में छाप रहे थे। गरीबों की अनुमति की भी कदर नहीं होती। रोनी के भाई
ने कसम खा ली थी कि वह तंबू नहीं छोड़ेंगा और इतने में ही पुलिस आ गई। रोनी के भाई का गर्म खून
था तो वह भी वाद विवाद करने लगा, और थोड़ी ही देर में पुलिस डंडे से मारने लगी और बोल कर गई
कि एक घंटा है सामान लेकर बाहर चलने को। बंजर सी धरती पर रोनी की माँ, रोनी और उसके अधमरे
भाई को लेकर बैठी थी एक बड़े से झोले के ऊपर जिसमें उसके घर का सारा सामान आ गया, और फूट
फूटकर रो रही थी, क्योंकि पता नहीं था कि आगे करना क्या है। झुर्रियों वाली चेहरे पर आंसु और मिट्टी
का अलग ही समावेश देखने को मिल रहा था। अकेली औरत गांव से दूर, बहुत कुछ था जो उसके
दिमाग में चल रहा था। उसी दौरान एक बहुत ही हट्टे कट्टे मोटे से पंडित जी गणेश की मूर्ति को लेकर
रास्ते से जा रहे थे, मूर्ति की दायिनी ओर चूहे का चित्रण था जो कि शायद लड्डू खा रहा था।

Picture Courtesy : http://www.instagram.com/abhi_sheikh_chhilli/

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By Heerak Singh Kaushal
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A person who is not afraid to 'call a spade, a spade'. You can often find me in two moods, either talking to everyone or just a quiet child. I live in a bubble that whatever it is shown in the newspapers, people are still good at heart. I wish you the best and may your pain just blow away!
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