तुम्हारा प्रेम मानो समुद्र मंथन से निकला अमृत,
बहुत दुनियावी, बहुत समाजिक,
मानो समेटकर बैठा हो अपने अन्दर पुर्ण दुनिया,
अलग सी, अखबारों के परे वाली,
शायद होता होंगी उसमें सारी परियां,
जो सुनता था मैं बचपन में।

तुम्हारा प्रेम मानो समुद्र पानी का, टटोले हर जहाँ,
निर्मल इन्द्रधनुष की भान्ति, बखेरे हर रंग,
मानो उतना ही आवश्यक संसार में,
जितनी रही सभ्यताओं के विकसन के लिए भाषा।

पर,

मेरा प्रेम उपजता है, कुंठा, कपट और कलंक से,
जो बसती है नींव बनकर समाज की,
मेरा प्रेम मानो, हलाहल,
जो बाॅट देखे शंकर की,
क्यूंकि शंकर ही उसे निभा पाये।
मेर प्रेम अलग है,
दुनियावी नहीं,
ये निचोड़ता है, नये युग्म को,
उस सबको जो फैंक बाहर किया तुमने,
मेरा प्रेम अनावश्यक रूप से रहता है कुपित,
ये देखता है यौवन को,
और खोजता है दाम्पत्य में तुम्हें,
ये बाँधता है, अनायास ही,
बाँधना मुझे भी पसंद नहीँ।

मेरा और तुम्हारा प्रेम,
उतना ही पृथक,
जितने तुम और मैं।
और फिर भी मैं चाहता हूँ,
कि तुम आओ और कहो,
कि ये प्रेम निभ पाएगा!

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