खून से लिखी हुई मेरी तकदीर,
हां मै ही हूं धरती का स्वर्ग कश्मीर।
मेरी फुलों की घाटी अब रोती है तन्हाई में,
बर्बाद हो रहा हूं मजहबों की लड़ाई में।
खूबसूरत वादियों में अब डर घूमता दिखा है,
हां मैंने इन चंद अल्फाजों में कहानी-ए- कश्मीर लीखा हैं।
यहां अब बच्चों की किलकारी नहीं बंदूकों का डेरा है,
घाटी जन्नत को ये किस साए ने घेरा है।


यहां रहने वाले इंसानों के हौंसले मजहबों ने तोड़े हैं,
तिरंगा फहराने जा रहे रास्ते में भी देखो कितने रोड़े हैं।
“हम सब एक ही हैं” कहने वाली भूमी ये सियानी थी,
शिव-शंकर की ये घाटी कल्याणी थी।
हां लेकिन इस साल घाटी में कुछ आराम है,
लगता है ये धारा 370 हटाने का ही सारा काम है।
लड़ाई की इस घाटी में अब एक ही शांति तिरंगा फहराया है,
खौफ नहीं इस बार सबके चेहरे पर सुकून लहराया है।
बस अब कभी यहां नफरत की बंदूकें ना तने,
मानवता में उठे हाथ अब खून से ना सने।
ना बने हिन्दू, ना बने मुसलमान,
अब सब यहां नेक इंसान बने।

घाटी कश्मीर मेरी एकता की मसाल बने,
हां ऐसा गुलिस्तां मेरा हिंदुस्तान बने।