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गोश्त

गोश्त

मेरी कविता जरूरी नहीं, कि प्रेम से तालुकात रखें।
वह भूख से भी रखती है जो यूं ही दिखती है मरती सड़कों पर, मेरी कविता उस गोश्त से भी रखती है जो शायद 9
साल से दुनिया में है,
सड़कों पर वैराग्य में जीता है,
खलकों से अपने बारे में सुनता है,
चित्थड़ों से ढकता वह गोश्त,
उसको एक रईस कल ₹5 देकर गया था,
वह दया दया ही थी यह कहना मुश्किल है।
आज सुनने में आया कि गोश्त ठंडा है,
उसके आसपास कुछ कौए और चील घूम रहे थे,
गोश्त में रस की मात्रा भी कम थी,
रिवायत है कि दफना देना चाहिए,
पल वक्त वक्त बदलता रहता है इंसान,
और बदलती रहती हैं रिवायतें,
9 साल पहले उसे छोड़ कर गया था कोई कमबख्त,
और वह किसी दूसरे कमबख्त का शिकार हो गया,
गोश्त जी रहा था शायद से,
गोश्त में रस के मात्रा कम थी,
और आते जाते कोई रईस उसे ₹5 दे देता था,
वह दया दया ही थी यह कहना मुश्किल है।

Photo Courtesy : http://www.instagram.com/abhi_sheikh_chhilli/

About The Author

Heerak Singh Kaushal

A person who is not afraid to 'call a spade, a spade'. You can often find me in two moods, either talking to everyone or just a quiet child. I live in a bubble that whatever it is shown in the newspapers, people are still good at heart. I wish you the best and may your pain just blow away!

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