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सारंगी

सारंगी

प्रेम और ग्लानि दोनों ही अनुभूतियां बहुत महत्व रखती हैं। प्रेम के मार्ग पर यदि ग्लानी ना हो तो बात ही क्या, पर दुख है कि यह अनुभूतियां बार-बार अपने मार्ग से एक दूसरे को काटते हुए निकलती है। दोनों ही अनुभूतियां उतनी ही प्रभावशाली भी है। मानो किसी के जीवन को सवार या बिगाड़ दे।
1947 में आजादी के बाद शरणार्थियों के लिए जगह ढूंढना शुरू कर दिया गया था। नेहरू जी का सपना भी था कि कोई ऐसी जगह बनाई जाए, जहां पर हम आधुनिकता का परचम लहरा सकें। तब चंडीगढ़, चंडीगढ़ नहीं था मात्र 59 गांव का समूह था। जगह ढूंढने की फिराक की गई तो सारे आला अधिकारियों को मानो एक मोती सा प्रतीत हुआ। कोशिश की गई कि वहां के गांव के लोगों को नई जगह देकर उनको वहां से भेज दिया जाए जब जब भी बात होती गांव के सरपंच यही मुद्दा उठाते कि यदि वे नहीं जाएंगे तो क्या, क्या उन्हें मार दिया जाएगा? मध्यस्थ के ऊपर काफी दबाव था तो उसने भी कहा,”हाँ, मार दिए जाओगे।” अंत में वे अलग ही प्रकार की सत्ता के शिकार हुए, आजाद देश में गुलाम हुए।

उन्होंने सोचा नहीं था कि वे गोरों की सरकार को कभी पसंद करेंगे, पर क्योंकि उनकी सत्ता ने उनसे उनकी जमीनें छीन ली,
तो क्या ही कहा जाए।
ऐसे ही एक गांव में रहते थे मनोहरी लाल और कुसुम देवी, मनोहरी सारंगी बजाते थे और कुसुम देवी ढोलकी। कहते हैं मनोहरी लाल के पिता पहले विश्व युद्ध के दौरान शहीद हो गए थे। माता ने सिलाई कर के घर का गुज़ारा किया। एक बार मेले में मां के साथ गए तो वहां पर सारंगी को देखकर अत्यंत ही प्रसन्न हुए, मानो खोजी को हीरा मिल गया हो। ज़िद्द करने लगे, मां के पास ज्यादा पैसे तो नहीं थे पर बेटे के स्वभाव को देखकर वह मान गई। पास वाले मंदिर में नवरात्रों में एक भजन मंडली आती थी और उनसे ही मनोहरी सारंगी सीखते थे। देखते ही देखते काफी अच्छा बजाने लगे और कुछ समय बाद पता चला कि उनकी मां दमे की शिकार हो गई, मनोहरी 19 साल का था अभी कानूनी तौर पर 2 साल पड़े थे उसकी शादी को पर मां चाहती थी कि वह अपनी बहू देखकर ही जाए, उसने उसका विवाह करवा दिया। गांव में कोई भी उत्सव होता तो मनोहरी को बुलाया जाता, उसकी सारंगी बहुत ही विख्यात होने लगी थी, तो इस वजह से घर का खर्चा आसानी से निकल जाता था।

शादी के 2 महीने बाद ही उसकी मां चल बसी। गांव में हड़कंप मचा, कहने लगे कि नई बहू आई और देखो अपनी सास को ही खा गई।
प्रत्येक व्यक्ति के अंदर कला बसती है। बात होती है उसको बाहर लेकर आने की। और पता नहीं क्यों प्राचीन काल से ही स्त्रियों को हर एक प्रकार की कला में तीक्ष्ण बनाने की प्रतिस्पर्धा चली रहती थी। भले ही पितृसत्ता के कारण भी कला घुंघट के अंदर ही छुपी रहती थी, पर होती थी। मनोहरी की पत्नी कुसुम भी ढोलकी बहुत सुंदर बजाति थी। एक दिन यूं ही बगल वाले घर के कीर्तन में अपनी पत्नी को ढोलकी बजाते हुए देखा तो अचरज में पड़ गया। वह अपनी पत्नी की कला को यूंही पल्लू में रहते हुए नहीं देख सकता था। अब निर्णय हुआ कि जहां वह जाएगा, वहीं पर उसकी पत्नी ढोलकी बजाने भी जाएगी। कुसुम खुश थी आखिर उसे यश की प्राप्ति हो रही थी। जहां एक तरफ गांव की सारी औरतें पल्लू को आगे रखकर किसी के सामने बोलती भी नहीं थी, वही कुसुम बिना पल्लू के ढोलकी बजाते हुए अपने ऊंचे स्वर लगाती थी।

कुसुम की दो संताने थी एक बड़ा बेटा जो दिमाग से ठीक नहीं था और दूसरा जो काफी चतुर। बड़े बेटे का नाम केशव था, शरीर से थोड़ा मोटा और क्योंकि दिमागी हालत उसकी ठीक नहीं थी तो लोगों पर भड़क जाता था। पिता से कभी प्रेम भी नहीं मिला, माँ ही थी जो उसका बचाव करती थी। गली वाले बच्चे उसको तंग करते थे, बहुत बार ऐसा भी हुआ कि उसके कपड़े को खींच खींच कर जाते थे, केशव परेशान रहता था। एक बार गुस्से में आकर उसने पत्थर मार दिया, एक बच्चे को लगा, उसके सर से खून आ रहा था। गली की सारी औरतें इकट्ठे होकर कुसुम से लड़ने चली आई उसको ताने मार रही थी, कहीं ना कहीं उनकी बात में ईर्ष्या का भाव भी नजर आता था। कुसुम क्षमा याचना कर रही थी। मनोहरी को शाम को जब यह बात पता चली तब कुसुम पर चिल्ला पड़ा, बोला कि “तुम ही हो ना जो इस मोटे से दिमागी पैदल गधे की बात मानती रहती हो, संभालो इसको, बांध के रखा करो।”
केशव यह सब सुन रहा था, मां के आंसू देख रहा था, देख रहा था कि उसकी मां को उसकी वजह से सुनना पड़ रहा है। वह कुछ करना चाहता था। उसकी मां को उसके मोटापे की वजह से, उसकी वजह से सुनना पड़ा उसने निर्णय लिया कि वह खाएगा पिएगा नहीं, और पतला होगा, ऐसी सनक सवार हो गई उस पर कि उसने रात का खाना नहीं खाया मनोहरी थोड़ा खुश हुआ, 2 दिन बीत गए, 3 दिन बीत गए पर वो अब भी अड़ा रहा कुसुम को उसकी चिंता हो रही थी कुसुम उसके सामने बिलखती रोती थी, पर वो कुछ नहीं खा रहा था, कुछ नहीं पी रहा था। अब मनोहरी को भी उसकी चिंता हो रही थी। हकीम को बुलाया पर वह भी कुछ ना कर पाया, जब इंसान में जीने की इच्छा ही ना हो, इंसान जब एक चीज को पकड़कर सनक पर सवार हो जाए, दृढ़ निश्चयी हो जाए तो कौन सी दवा काम करेगी, समझने को तैयार नहीं था वो, उसको यह नहीं था कि वह मर जाएगा उसको बस यही था कि उसने पतला होना है, माँ के लिए कुछ करना है। 11 दिन बिना खाए पिए उसकी मौत हो गई। अर्थी को उठाना भी ऐसा लग रहा था मानो कोई डिब्बा उठा रहे हो।
छोटा बेटा शंकर था, काफी चतुर तीक्ष्ण दिमाग का। गांव के सरपंच से मनोहरी की जान पहचान अच्छी थी। सरपंच ने शंकर का पास के ही किसी स्कूल में दाखिला करवा दिया। अभी मैट्रिक पास ही की थी कि उसको तहसीलदार की नौकरी भी मिल गई। कुसुम ने हर जगह मिठाई बाँटी।
शंकर तहसीलदार पर ही रुकना नहीं चाहता था, उसने कलेक्टर का पेपर दिया और उत्तीर्ण किया।
भारत आजाद हो रहा था। और शंकर इसी दौरान कांता नाम की एक लड़की के प्रेम में पड़ा। मानो शंकर को कोई जीने की वजह मिल गई हो। कांता अमृतसर के किसी कॉलेज में पढ़ाती थी। एक कार्यक्रम में दोनों की मुलाकात हुई। दोनों के घर वाले तैयार भी हो गए थे। जात पात का भी कोई चक्कर नहीं पड़ रहा था। लड़की के घरवाले देख कर खुश थे कि शंकर कलेक्टर है, अब उसका इतिहास मायने नहीं रखता था।
धूमधाम से शादी हुई। कांता को उसके सास और ससुर कभी पसंद नहीं आए, वह आधुनिक समाज की महिला थी, आधुनिक विचारों वाली और वहीं दूसरी ओर उसके सास-ससुर को भी कांता पसंद नहीं आई, पर बेटे की ज़िद्द के आगे क्या करते। कांता को यह नहीं पसंद था कि उसके सास-ससुर जगह-जगह जाकर गाना बजाना करते थे। उसने बोला भी शंकर को, उकसाया भी कि उन्हें मना करते हैं और अब जरूरत भी क्या थी गाना बजाने की, समाज में शंकर और उसकी कोई इज्जत है। पर शंकर जानता था यदि वह ऐसा करेगा तो वह बहुत ही गहरा ठेस पहुंचाएगा। पिता की मां के मरने के बाद यदि पिता को कोई दूसरी चीज सबसे ज्यादा पसंद थी तो वह थी उनकी सारंगी और उनका गायन जिसने उनको हमेशा जीवित रखा। पर शंकर भी यही चाहता था कि वे छोड़ दें, वह उन्हें यह भी कहता था कि वे उसके पास आ जाएं। नौकर चाकर थे, सब कुछ ख्याल रखा जा सकता था। पर मनोहरी का दिल नहीं मानता था। जिस गांव में शंकर पला बढ़ा, वह पला पड़ा, कुसुम की शादी हुई, कांता की शादी हुई, उसका रसन बसन हुआ वह उसको एकदम से छोड़कर किसी आधुनिक सुख के लिए कैसे जा सकता था।

1948 मे सरकार ने चंडीगढ़ को बनाने के आदेश दिए और उन सरकारी आला अफसरों में शंकर की भी प्रतिबद्धता की गई।
शंकर ने सारे गांव वालों से बात की और उनको जाने के आदेश भी दिए । उनको नई जगह भी दे दी गई जो इतनी बंजर भी नहीं थी, इतनी ठीक भी नहीं थी, नए सिरे से रहना था बस उस पर। सरकार शंकर की चतुराई देख कर खुश थी। पर शंकर के खुद के गांव के लोग ही उसकी बात नहीं मान रहे थे।
जब बाद में मध्यस्थ ने यह बोला कि गोली मार दी जाएगी, तो मानो गांव में हड़कंप सा मच गया। सारे यही सोच रहे थे कि वही शंकर जो उनके गांव में पला बड़ा, जो उनके साथ खेला करता था, वह आज उनको गांव से तो निकाल ही रहा है पर साथ ही साथ मारने की भी धमकी दे रहा है। सारे लोग मनोहरी को एक हीन नजर से देख रहे थे। उसका कुलदीपक आज कुलघातक बन चुका था।
आखरी दिनांक भी निश्चित की गई गांव को खाली करने की, वरना अगले दिन से शायद गोलीबारी चालू हो जाती। शंकर खुश था अब उसके मां-बाप कीसी नए गांव में नए सिरे से शुरुआत करने की जगह उसके पास ही आते और इसी बहाने उसे किसी प्रकार की शर्म भी ना झेलनी पड़ती। पर मनोहरी टूट चुका था, उसको लगा था कि उसका बेटा कुछ अच्छा कार्य करेगा। उसे यह तो पता था कि उसका बेटा तब किसी दूसरे सरकार के अंदर था पर अब अपनी ही सरकार के अंदर अपने ही लोगों के साथ दगा, उसे खा चुका था। शंकर ने अपनी गाड़ी नौकरों के साथ सामान को उठाने के लिए भिजवाई। मनोहरी की आंखें मानो फूटने वाली थी। पर वह कुछ कर नहीं सकता था। कुसुम की तो आंखों ही सूज चुकी थी, दोनों रोए जा रहे थे पर मनोहरी अब हार नहीं मानना चाहता था, वो लोगों के सामने क्या मुंह लेकर जाता। उसका बेटा सारे गाँव का भक्षक बन चुका था, शंकर के नौकर सारा सामान उठा रहे थे और इसी बीच उन्होंने सारंगी को भी छुआ, मनोहरी आग बबूला हो उठा। उसने सारंगी छीनी और अपने आपको कमरे के अंदर बंद कर दिया।
कुसुम दरवाजे को पीटने लगी, उसको डर था कि कहीं कुछ अनर्थ ना हो। इतनी ही देर में सारंगी के तीक्ष्ण ध्वनि उसके कानों में पड़ी। आज शंकर गाना गा रहा था पर उसकी आवाज में मधुरता नहीं थी, एक विलक्षणता थी, एक भाव था जो रूद्र रूप ले चुका था, मानो कोई विरह की अग्नि में तड़प रहा हो, मानो कोई अपादान की क्रिया से अभी छूटा हो, ऊंचे ऊंचे विद्रोह के स्वर। नौकर हैरान थे पर मालिक का कहा कैसे टाल सकते थे, जितना भी सामान कमरे के बाहर पड़ा था वे उन्हें ही उठा कर चलते बने। सोचा शंकर को जाकर सारी बात बता देंगे और शंकर अपने आप इलाज देखेगा। स्वरों के बीच में कुसुम के रोने की आवाज भी आती थी विद्रोह के स्वर मानो किसी एक व्यक्ति पर हजारों साल से किसी प्रकार की प्रताड़ना हुई हो और वह आज खुल कर बाहर आ रहा हो। सुबह-सुबह गांव वाले सारे हैरान थे पर वह उस स्वर वाले को नहीं देखना चाहते थे, ना ही देखना चाहते थे कि वह रो रहे हैं, या जिंदा है या मर चुके हैं। उनके लिए यह परिवार पहले ही मर चुका था। गांव के सारे लोग सामान उठाकर अपने-अपने बैलों पर लादते, घोड़ों पर लादते और आगे बढ़ते रहते।
कुसुम रो रही थी सुबह से दोपहर हुई गाना नहीं रुका। आधा गांव खाली हो चुका था अंत में सरपंच ने निगरानी करते हुए देखना था कि कौन-कौन रह गया है पर चूंकि सरपंच भी इन लोगों से नाराज था तो इसने उन लोगों को नहीं बुलाया ।शाम होने को आई थी सरपंच भी जा चुके थे। कुसुम जोर-जोर से दरवाजा पीट कर बता रही थी कि देखो सब चले गए हैं। पर सारंगी बंद नहीं हुई, आवाज में दर्द कम नहीं हुआ, आवाज एक भी पल के लिए सुबह से लेकर शाम तक बंद नहीं हुई थी, और ना ही उसकी क्षमता, हाथों से खून कम नहीं हुआ, बजाते बजाते हाथ गलने लगे थे, कुछ रुक नहीं रहा था और एकाएक सब कुछ रुक गया।

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About The Author

Heerak Singh Kaushal

A person who is not afraid to 'call a spade, a spade'. You can often find me in two moods, either talking to everyone or just a quiet child. I live in a bubble that whatever it is shown in the newspapers, people are still good at heart. I wish you the best and may your pain just blow away!

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