शिकायतें हैं तुमसे,
तुम, जो इधर – उधर देख रहे हो,
हां, तुम ही से।
क्यों तुम मुझे यूं मझधार में हर बार छोड़ कर चले जाते हो?
चेहरे बदल – बदल कर बार बार आते हो,
मेरा हाथ थामते हो, और फिर मुड़ जाते हो।
तुम तो चले जाते हो, लेकिन एक एहसास सा रह जाता है,
तुम्हारे जिस्म का, मेरी खाली बाहों में ।

चाहतें हैं तुम्हारी,
तुम, जो खुद को कुछ नहीं समझते,
हां, तुम ही।
तुम शायद अपने लिए कुछ भी नहीं,
शायद इसीलिए तुम मेरा ये लगभग बेजान सा दिल बार बार तोड़ जाते हो,
तुम खुद को किसी के लायक ही नहीं समझते,
तुम मेरे लिए खुदा से भी बढ़ कर हो,
खुदा को तो मैं फिर भी दिन में ज़्यादा से ज़्यादा चार – पांच बार याद करती हूं, पर तुम तो हर पल मेरे ज़हन में रहते हो।

मुहब्बत है तुमसे,
तुम, जो मुझे हज़ारों बार रुला चुके हो,
हां, तुम ही से।
तुम्हे छूने की तम्मन्ना है,
तुम्हारे दीदार की कशिश है,
तुम्हें पाने की चाह है।

तुम्हारा अक्स खुद में देखती हूं मैं।
तुम में मैं ही तो हूं,
मुझ में तुम ही तो हो।

फिर क्यूं इतना मुश्किल है मुझे समझ पाना तुम्हारे लिए?

बहुत शिकायतें हैं तुम से,
तुम, जो मुझे पलक झपकाए बिना निहार रहे हो,
हां तुम ही, जिसकी आंखों का रंग मेरी ही आंखों सा है,

तुम, जिसकी आंखों में मैं खुद को देख सकती हूं,
हां तुम ही तो हो।
.
.
.
.
.
.
Photo Courtesy : https://www.instagram.com/p_paradox07/

Check out more content at:

https://gogomagazine.in/writeups/