“तुम मेरी नहीं हो सकती क्या?” उसने दबी आवाज़ में कहा
उस वक़्त तो मिठू के प्रश्न का कोई जवाब नहीं था मीरा के पास, शायद था भी मगर उसे समझा पाना बहुत ही कठिन था।

मीरा बिना कुछ कहे, आंसू सहेजते हुए मिठू की गली से निकली।
विडंबना है जो मुंह कभी बोल नहीं पाते, आंखें कहते हुए हिचकिचाती नहीं। आंसू गवाह थे की पीड़ा तो अवश्य थी , मगर हिज्र की मज़बूरी रही होगी।

मिठू अपना हाथ मीरा की तरफ हाथ खड़ा किए , उसे ओझल होता हुआ देख रहा था। वैसे तो उसे पीड़ा का एहसास हमेशा ही था, पहले गरीबी, फिर मां का देहांत, उस दिन मगर कुछ बात थी, दिल में कसक थी, मुंह करकरा , आंखें लाल थी। दिल्ली की संकरी गली से मीरा को गायब होते देखा, तो वापस अपनी झुग्गी में लौट आया। मोमबत्ती धीमी जल रही थी । घर केवल दो मोमबत्तियों से रौशन रहता था, घर पर बिजली का कनेक्शन नहीं था। अंदर आते ही वो फर्श पर बिछे बिस्तर पर लेट गया, दिल बेचैन हो रहा था तो वापस उठकर बैठ गया।
मोमबत्ती पर ध्यान दिया तो उसे ठीक करने उठा,

” क्या मजबूरी रही होगी? उसने मुझे बताना भी ठीक ना समझा। क्या उसे कोई और पसंद आ गया है? मगर मीरा कोई ऐसी वैसी इंसान नहीं है! दृढ़ निश्चयी है, रिश्तों के मायने जानती है! मगर हूं तो मै एक मजदूर ही । गरीब का आखिर कौन होता है?”
बत्ती को ठीक करते हुए वो मन ही मन सवाल करने लगा कि अचानक से आंखों से बूंद गिरी और मोमबत्ती बुझ गई।

मीरा , चेहरे को अपनी गुलाबी चुन्नी से छिपाए, घर पहुंची । कोई बड़ा महल नहीं था उसके पास, मगर हां मिठू के मुकाबले उसके घर के हालात ठीक थे। घर में मां थी, पिता थे और एक बहन थी। अपने घर में मीरा सबकी लाडली थी, उसका एक कारण था घर में उसका सबसे छोटा होना और दूसरा उसकी बुद्धिमत्ता और सहजता। मीरा हमेशा से ही एक ऊंचे ख्यालात की लड़की थी। वह हमेशा अपनी उम्र से ऊंचा सोचा करती। लोग अक्सर उसकी बातें सुन दंग रह जाते थे।

घर पर आते ही, वो अपने कमरे की ओर दौड़ी और अंदर से दरवाज़ा बन्द कर लिया । उसने पुराने मेज़ के ड्रॉअर में पड़ी किताब निकाली, और हड़बड़ाहट में पन्ने पलटने लगी। किताब ज़्यादा पुरानी नहीं जान पड़ती थी , हां मगर उसके बहुत से पन्ने भरे हुए थे। मीरा ने एक कोरा कागज़ निकाला , कलम उठाई और कुछ तेज़ी से लिखने लगी।

” खाना लग गया है मीरा!” मां ने रात के भोजन के लिए बुलाया तो मीरा को समय का एहसास हुआ।

मीरा कुछ घंटे पश्चात , गुलाबी चुन्नी ओढ़ कर, सूर्य उदय से पहले घर से बाहर निकली। हाथ में एक मुरझाया सा कागज़ लिए मिठू के दरवाज़े पर दस्तक दी।
मिठू बाहर आया तो मीरा को इतनी सुबह देख परेशान हुआ।

” क्या हुआ मीरा? तुम इस वक़्त यहां?”

मीरा ने मुरझाया हुआ पत्र मिठू के हाथ पर रख दिया। उसे गले मिली और बिना कुछ कहे चल दी।
मीरा का पत्र लेते ही मिठू अपनी झुग्गी में दौड़ा, हड़बड़ी में उसे खोला।

” प्रिय मिठू,
अब हिज्र का वक़्त है, जिस दुविधा में मै तुम्हें छोड़ आयी थी, उसका जवाब देना चाहती हूं।

मैं तुम्हें अपना नाम से नहीं जोड़ना चाहती, नाम के जुड़ने में अपरिचित होना है, विलाप है। पहचान को खोना पाप है, सृष्टि की रचना का अपमान है। किसी को खुद से जोड़ लेने के बाद, हम दुनिया को खुद से जोड़ने में विफल हो जाते हैं । तुम्हारी जैसी सादगी और दया शायद ही मैंने किसी में देखी है। मैं तुम्हें अपना बना कर दुनिया को तुम्हारी इन भाव से वंचित नहीं रख सकती। मुझ से ज़्यादा , तुम्हारी ज़रूरत इस दुनिया में हर एक अच्छे इंसान को है जिसका रात को आंसू बहाना मुझे पीड़ा देता है, तुम्हारा प्रेम उन की ज़रूरत है जिनका रात को खाली पेट, बर्फीली रातों में अध्नग्न अवस्था में आंखो को सुकून और शरीर को बचाने का प्रयास करना मुझे सोने नहीं देता है,
तुम अपना प्रेम बचा कर रखो विशेष जनों के लिए जिनको दूसरों से पीड़ा के अलावा कभी कुछ नहीं मिला।
तुम इंसान के रूप में इक नूर हो, और रौशनी का सिर्फ एक हकदार नहीं हो सकता।

प्रेमिकाएं लड़ती होगी दुनिया से अपने प्रेम के लिए, लेकिन तुम्हें दुनिया के लिए संजो के रखना ही मेरी लड़ाई होगी ।”

उसे पढ़ने के बाद दो मिनट के लिए वो स्थिर हो गया।
अचानक से आंख से अश्रु गिरा और पास में पड़ी आख़िरी मोमबत्ती भी बुझ गई। होश आया तो पाया कि बाहर सूर्योदय की पहली किरण पड़ चुकी थी।

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