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रैन बसेरा

रैन बसेरा

यह बात तब की है जब शैली पैदा हुई थी किसी बड़े अस्पताल में नही, अपनी दादी की छोटी सी झोपड़ी में जो उस इलाके की शान समझी जाती थी। शैली का जन्म हिमाचल के मंडी जिले के छोटे से गांव में हुआ, घर में एकलौती बच्ची होने के कारण दादी ने घर में ही मिठाइयां बनाई और बांट दी।

ठंड के मौसम में दादा आग लगाकर कमरे को गर्म रखने में व्यस्त रहते थे। पापा सरकारी नौकर थे और दूर शहर में नौकरी करते थे, चाहते तो वहीं किसी अस्पताल में शैली को पाला जा सकता था पर दादी की जिद्द के सामने किसी की ना चली। 14 दिन पूरे होने पर पापा गाड़ी भाड़े पर लेकर शहर में वापस जाने के लिए तैयार हो गए और साथ में छोटी सी शैली भी। रोते हुए भी दादी काला टीका लगाना नहीं भूली।

वो साथ भी नहीं चलना चाहती थी क्योंकि जब आखिरी बार गई थी तब बहुत बीमार हो गई थी, शायद शहर का वातावरण उसको भाता नहीं है। साल बीतते रहे और शैली बड़ी होती रही। अब वो हर गर्मियों की छुट्टियों में दादा दादी के घर आती। दादा के साथ खेतों में काम कराती और दादी के साथ लिपटकर सोती, उनके झुरियों वाले चेहरे को खींचती और उनके हाथ से ही खाना खाती।

पर हर बार उसे एक चीज हमेशा तंग करती थी और वह थी उस झोपड़ी के कोने की खपरैल का टूटा होना। वह कोई अधिक खर्चे वाली बात नहीं थी। यदि दादा थोड़े कम उम्र के होते तो वह स्वयं ही उसे ठीक कर देते और पापा को तो यह सब आता ही नहीं था। ऐसा भी नहीं था कि उस खपरैल के टूटे होने से कुछ बहुत बड़ा नुकसान हो रहा था।

पर टूटी हुई चीज ठीक तो होनी ही चाहिए थी। जब भी शैली अपने पापा से जिक्र करती तो आलस की वजह से पापा उसे टालते। यह कहते कि करवा दूंगा या फिर यह कि उससे कुछ नुकसान थोड़ी ना होता है। शैली की दादी भी अपने बेटे को तंग ना करते हुए शैली को प्यार से मना लेती।

शैली आज 23 साल की युवती है और बैंक में नौकरी करती है। उसके मां-बाप की कार का ट्रक से टक्कर होने से देहांत हो गया था। 6 महीने पहले उसकी दादी और दादा डेंगू के शिकार हो गए थे। अकेली शैली अब जब भी बहुत असहाय महसूस करती है तो उस झोंपड़ी में जाती है।

अब उसके पास पैसे तो हैं पर वह खपरैल ठीक नहीं करवाना चाहती, उस गांव में उसकी सिर्फ वो झोंपड़ी और उसकी टूटी हुई खपरैल ही तो उसके लिए शेष है। आज फिर वह झोपड़ी में है और उस खपरैल को देखकर उस गर्मी को याद कर रही है, उस झूरी वाले चेहरे को याद कर रही है, और उन खेतों को याद कर रही है।

भले ही उसकी नौकरी शहर में है पर उसके लिए तो वो टूटी हुई खपरैल वाली झोपड़ी ही उसका घर है। वहीं पर उसको शांति मिलती है और चाहे जो हो जाए वो ना तो उसे ध्वस्त होने देगी ना बिकने देगी, क्योंकि वही उसकी पहचान है वही है उसका रैन बसेरा।

Photo Courtesy : https://www.instagram.com/pradyum_nohara/

About The Author

Heerak Singh Kaushal

A person who is not afraid to 'call a spade, a spade'. You can often find me in two moods, either talking to everyone or just a quiet child. I live in a bubble that whatever it is shown in the newspapers, people are still good at heart. I wish you the best and may your pain just blow away!

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