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ब्रह्मांड

ब्रह्मांड

मैंने स्वयं को दो ब्रह्मांडों के मध्यस्थ पाया है,
एक से दूसरी छोर की ओर कूदते हुए,
एक ब्रह्मांड जिसमें सभी समाए हैं,
और दूसरा जिसमें मैंने सभी को समाया है।
दोनों ही ब्रह्मांडों में बदलाव निश्चित रहा है,
खोखला सा, ज़रूरी-गैर ज़रूरी सा बदलाव।
दूसरे ब्रह्मांड में सृजन और विनाश पल पल करता रहा हूं मैं,
पर मात्र यह दो, बाकी सब अनियंत्रित ही रहा,
यह भी देखता रहा कि किस प्रकार स्वयं को दूजे का ही हिस्सा मात्र पाया।
यह ब्रह्मांड मुझे मुक्त करता है, वास्तविकता से,
जो परचम लहराए खड़ी है दुर्ग पर,
मुझे ले जाने के लिए।
ठीक उसी प्रकार जैसे चींटियाँ ले जाती हैं किसी कीट के शव को,
चबाकर, अलग कर, मिलकर, उठाकर।
दूसरे ब्रह्मांड में पहले की ही भांति सौरमंडल को जाँचता हूं मैं,
पृथ्वी हूं, सब मेरा नज़रिया।
तारे बहुत हैं। उनका होना, ना होना कभी मायने नहीं रखा।
चंद्रमा, खूबसूरत, घटता-बढ़ता, बदलता ही रहा,
वक्त वक्त पर परखता है मेरे उत्थान को।
चंद्रमा का बदलना शायद जरूरी भी है।
पर सूर्य,
बहुत ताकतवर! इसका विनाश नहीं हो पाता।
खड़ा रहता है यह एक टक समान भाव से,
मैं पृथ्वी, मेरा नज़रिया।
इसका अस्त होता मेरे लिए,
उदय होता है मेरे लिए,
पर सूर्य का विनाश नहीं होता मेरे लिए!
सूर्य के विनाश का अर्थ होगा, सौरमंडल का विनाश!
ब्रह्मांड का विनाश! पूर्ण दूजे ब्रह्मांड का!!
फिर वही,
चींटियाँ आएंगी, शव ले जाने के लिए।
और रह जाएगा मात्र एक ब्रह्मांड,
तारों का कहना है, जो ज़रूरी है।
~कौशल

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About The Author

Heerak Singh Kaushal

A person who is not afraid to 'call a spade, a spade'. You can often find me in two moods, either talking to everyone or just a quiet child. I live in a bubble that whatever it is shown in the newspapers, people are still good at heart. I wish you the best and may your pain just blow away!

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