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बीज

बीज

एक बीज मिट्टी में बोया गया,
मिट्टी में संयम था, त्याग था,
बीज में भरा था दृढ़ निश्चय ,
अंकुरित होकर ,
उसने सौम्यता पाई।
ज़मीन के अंदर होकर भी,
ज़मीन के बाहर होकर भी,
कोमलता रखना आम नहीं ।
अंदर होना अब केवल माज़ी है,
इस माज़ी के बावजूद,
स्थिरता होने के बाद भी,
ऊंचाइयों में समाया जा सकता है।
और कितना ऊंचा होना है,
ये जान लेना आवश्यक है,
ज़्यादा ज़ोर देने पर
जड़ें टूटने लगती है।
उत्कृष्टता के बाद पतन होना भी
लाजमी है,
तुम्हें मैं सींचू सौ बार,
तुम्हारी मुरझाई पत्तियां
अब हरी कहां होंगी?
तुम्हारी सूखी डालियों में
अब जान कैसे आएगी?
तुम्हारा अंत तय है।
ये ज़रूरी नहीं की तुम कितना ऊंचा उठे,
ज़रूरी है कि तुम्हारा उठ पाना
कितनों की प्रेरणा बना?
कितनों का जीवनदाई बना?
तुम बाहर कितना अटल रहे?
कितने गुणा तुमने संसार को वापस दिया?
तुम कितनी बार मुरझाए?
और कितनी बार फिर खड़े हुए!
जब माली ने तुम्हारी जड़ निकाली,
तुम में जीने का कितना हौसला था?
तुम्हारी जड़ अगर गहरी है,
तो तुम्हारा एक हिस्सा मिट्टी में रह जाएगा!
वो गहरी सतह हमेशा ही
शांति देगी, उन अभागी चींटियों को,
जिनके साथी कुचल दिए गए।
उन मकोड़ों को,
जिनका बाहर रहना महफूज़ नहीं!
तुम रहोगे अनंत काल तक।
इन शब्दों का रचना
मेरे मन में ख्याल लाया,
कवि क्या है?
केवल एक विराट , जटिल पौधा।

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About The Author

Vaishali Thakur

Vaishali Thakur, an undergraduate from Panjab University, expresses her opinions in the language that she dreams in: Hindi. Writing for four years exclusively in Hindi, she believes that all possess a unique power to inspire. She chose to unleash hers by writing. Coke Studio music, dogs and coffee appeals the most to her. A firm believer in the 'The power of one', she believes that a single person can make a difference in the world.

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