आओ सुनाएं कहानी सार में:
इक बार बैठे बैठे दरबार में,
साधारण से मुशायरा का आगमन
लाया एक बहुत कठिन प्रश्न
राजा ने पूछा ” कविताओं की भाषा
क्या होनी चाहिए?”
हाहाकार मचा
बारम बार मचा
सब उठ दिए, चिल्लाए
अपने अपने हथियार उठाए
कौम के सुर में सुर मिलाए
महाराज केवल उनकी भाषा अपनाए
सब देने लगे तर्क
गिनवाए भाषाओं में फर्क

अनुभव का बांधे चोला
एक बूढ़ा दरबारी बोला
“उर्दू ही है इस लायक
इसका पाठ सबसे संतोष दायक!”
बीच खोली से उठा एक अद्भुत
हिंदी प्रिय सेनानी आग बबूला
लाल हुआ, मुख से बोला
” सरकार, हिंदी को चुनिए
इसने हर लिपि पर कर्म किए”
राजा पड़ा सोच में, करने लगा विचार
हाय ! ये मचा कैसा बवाल!
पीछे से बोला अड़ियल पुरोहित
” ये सवाल है बेकार अभिजीत,
संस्कृत जितनी है कोई भाषा विकसित?”
वस्ल की उठाए पीड़ा
आशिक, दर्द की उठाए बीड़ा
सिसकर बोला
“मुहब्बत है , मुहब्बत है राजाजी,
हर कवि का रह चुका है माजी”

राजा हैरान
थक कर, होकर परेशान
कवि की तरफ मटकाए आंख
पूछे “तुम ही बोलो, कविराज
करिए कुछ कृपा, दुविधा का इलाज”
कवि झटाक से बोला
“महाराज ना उर्दू
ना हिंदी
ना संस्कृत
और महुब्बत भी नहीं
हर एक कविता रुक कर,
आती है केवल औरत पर:
स्रोत, शुरुआत या अंत।
मुझे हर नज़्म में दिखता है
महिला का घूंघट।
इसलिए मेरी मानिए तो
कागज़ों पर भी औरतों को
बना देना चाहिए
नज्मों की आधिकारिक भाषा।”

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