1947 की आज़ादी की लड़ाई के बाद बहुत सारे लोगों को इधर-उधर किया गया। एकाएक आज़ादी का मुद्दा, जीने का मुद्दा बन गया था। बहुत लोग मारे भी गए, बहुत लोग बचे। पर क्या आजादी मात्र गुलामी से छुटकारा पाना होती है? क्या लोग मानसिक आजाद हो पाए हैं? क्या कहीं भी घूमना फिरना आजादी ही है? बहुत सारे प्रश्न है, बहुत सारी बातें हैं।कुरुक्षेत्र को सबसे बड़ा शरणार्थी केंद्र के तौर पर देखा गया। कहते हैं पांच लाख से ज्यादा परिवार वहां पर स्थापित थे। झेलम मात्र 3 महीने की थी जब उसके पिता उसकी मां और उसके बड़े भाई को लेकर रावलपिंडी से कुरुक्षेत्र में आए थे। उसकी मां उसे बताती है कि यदि वह तब रोती तो सब को भनक पड़ जाती और सब को मार दिया जाता। इसलिए उसको अफीम दिया गया पूरे 1 महीने के लिए लगातार, ताकि वह नशे में सोई रहे।

उसके चेहरे को देखकर इतना सुकून मिलता था मानो झेलम मां के दर्शन कर रहे हो तभी उसका नाम भी झेलम रख दिया गया। झेलम के पिता वहां पर पंडिताई का कार्य करते थे, कुरुक्षेत्र आकर भी उन्होंने पंडिताई का कार्य जारी रखा, वशिष्ठ थे, अपने कुल के सबसे ऊंचे और क्योंकि कुरुक्षेत्र का अपना एक रहस्य है तो वहां पर पंडितों की कुछ ज्यादा ही पूछ भी होती थी। हर एक बात पर उनको आवश्यक समझा जाता था, श्राद्ध पर तो बात ही क्या, कभी-कभी झेलम की मां झेलम को लेकर दूसरों के घर में श्राद्ध के लिए जाती थी।

उनको कभी भी राशन, कपड़े, पैसे के लिए दिक्कत नहीं आई। झेलम के बड़े भाई का नाम सत्यम था। पिता ने सत्यम को तो विद्यालय में डाला पर, उनको झेलम को विद्यालय में डालना बात कुछ अटपटी सी लगी। ऐसा नहीं है कि वह स्त्रियों का सम्मान नहीं करते थे, हर सुबह दुर्गा चालीसा पढ़ते थे, पर स्त्री को विद्यालय में डालना यह बात अटपटी थी। झेलम के घर की दो गलियां छोड़कर ही मास्टरानी तारा देवी का घर था। पता नहीं क्यों कुछ ज्यादा ही प्यार था उनका झेलम से, और झेलम को भी उनसे प्यार था, हर रोज वे दोनों एक घंटा बैठते और कुछ ना कुछ पढ़ाई की बात करते। तारा देवी ने दो-चार बार पंडित जी को कहा भी, कि झेलम पढ़ने में अच्छी है, विद्यालय में दाखिला करवा दो। पर पंडित जी माने नहीं। वह यह सोच कर खुश थे कि बिना किसी पैसे के ही घर पर ही झेलम पढ़ना लिखना सीख गई।

झेलम पढ़ना-लिखना सीख चुकी थी। अब वह अलग-अलग प्रकार के उपन्यास पढ़ने की शौकीन होती जा रही थी। तारा देवी उसको तरह-तरह की किताबें लाकर देती। बुल्लेशाह, भारतेंदु, महादेवी वर्मा यह सब उसके खास होते जा रहे थे। किशोरावस्था में प्रेम से भरी रोमांचिक कहानियां कुछ ज्यादा ही रोमांचित करती हैं। यही कारण था कि अब वह प्रेम पढ़ रही थी, आलिंगन देख रही थी, स्नेह को भांप रही थी। चाहे उसने जितनी मर्जी किताबें पढ़ी हो पर उसकी सबसे अच्छी कहानी तो वही थी जो उसके पिता ने सुनाई थी, ‘जब सती ने पहली बार शिवलिंग को देखा उन्हे महादेव की अनुभूति हुई। उनको पता था कि वही है उनके पति, आराध्य, शक्ति और शिव।’ अपने पिता के कहने पर उसने सोमवार के व्रत रखने भी चालू कर दिए। हर कला में निपुण झेलम, खाना, कढ़ाई, बुनाई सब कुछ जानती थी।
मैट्रिक की परीक्षा खत्म होते ही सत्यम की पुलिस में नौकरी लग गई। जब झेलम 18 साल की हुई तो उसके भाई ने उसका रिश्ता एक सीनियर रूद्र सिंह से करवा दिया, जाति का क्षत्रिय। झेलम खुश थी। महादेव ने उनके ही नाम वाला वर उस के लिए ढूंढा था। रुद्र के पिता कैथल के ही एक गांव में जमीदार थे।

1966 मैं पता चला कि लाल बहादुर शास्त्री जो भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे उनकी ताशकंद में रहस्यमय तरीके से मौत हो गई और यहीं पर झेलम और रूद्र का विवाह हुआ, उसी शिव मंदिर में। रूद्र रोबीला इंसान था, मांस-मच्छी, शराब-मदिरा सब का पान कर लेता था। पहल पहल तो वह समझ नहीं पाई कि उसके भाई ने उसके लिए ऐसा वर क्यों ढूंढा, पर अब जो भी है यही है। रूद्र को गुडगांव भेज दिया गया। झेलम जान चुकी थी कि रूद्र में बहुत गुस्सा है। उसे हर छोटी बात पर गुस्सा आता था। सामान फेंकना, खाना फेंकना आम हो चुका था। मात्र 1 महीने के बाद ही खाने में लाल मिर्च ज्यादा होने की वजह से उसने झेलम को दो थप्पड़ लगा दिए। झेलम खूब रोई। उस रात्रि को जब उसके पति ने उसे रोते हुए देख कर भी अपना पति धर्म निभाया तब उसने डरे डरे, सहमे सहमे अपने आप को अर्पित कर दिया। वह बहुत सावधान हो चुकी थी। सावधानी से रोती। सावधानी से हर रात्रि को अपना धर्म निभाती। पर पता नहीं क्यों उसकी सावधानी कही न कही कम ही रह जाती और उस पर कहर टूटता। अब जिंदा लाश बनती जा रही थी, मार खाती और धर्म निभाती। भारत के प्रधानमंत्री तब श्रीमती इंदिरा गांधी थी, “लोह महिला” जिनको पूरी दुनिया एक बहुत ही ऊंचे दर्जे पर देखती थी। भारत में नारी सशक्तिकरण का एक अलग ही उदाहरण थी वह।

सावन का महीना आया। हर सावन के महीने में स्त्री अपने मायके जाती। उसने अपनी मां को सारी कहानी बताई, मां खूब रोई, ऐसा प्रलाप..उसने कभी नहीं सोचा… पिता को रोने का कारण समझ नहीं आया। उनका कहना था कि बाहर औरतों के साथ ऐसा ही व्यवहार होता है, हमारे घर में नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं कि तुम बाहर पूरी दुनिया को स्वर्ग ही समझो और अब तुम उस घर ब्याह चुकी हो तो उनके तौर-तरीके जानो। एकाएक झेलम के पैरों तले जमीन खिसक गई उसने कभी नहीं सोचा था कि उसके पिता है उससे पल्ला झाड़ लेंगे। मां ने सत्यम को बुलाकर बहुत सुनाया। सत्यम सब कुछ भूल चुका था। अब उसकी पदोन्नति हो चुकी थी। उसका रंग ढंग बदल गया था और पितृसत्ता में यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी को मार भी रहा है तो उसमें गलत ही क्या है? उसने कुछ काम किया होगा ऐसा।
झेलम और झेलम की मां सारा दिन बैठती और रोती, दोनों ही अपने आप को विवश पाती। झेलम वापिस गुडगांव आई। आते वक्त वह महादेव के मंदिर में नहीं गई।
पहली बार था जब वह अपने पति के साथ गांव में जाने वाली थी। उसके पति को शादी के बाद अब छुट्टी मिली थी। गांव में बहुत ही भव्य स्वागत हुआ उनका। तरह-तरह के व्यंजन बनाए गए। सारे गांव की औरतें इकट्ठी हो गई। आरती हुई, कलश रखा गया और न जाने क्या-क्या।

गांव में पितृसत्ता बहुत ही अच्छे तरीके से देखने को मिलती है।औरतें केवल और केवल घुंघट रखती हैं, बोलती भी नहीं है, मात्र सुनती हैं। उनके पति उन्हें कभी भी घर से बाहर निकाल सकते हैं। जलील कर सकते हैं, मार सकते हैं। यह अंदाजा झेलम को अगले दिन ही हो गया था जब उसके सामने उसके ससुर ने उसकी सास पर हाथ उठा दिया। बुजुर्ग विवश सास चुपके से उठी और चाय बनाने निकल पड़ी। शायद उसको दर्द नहीं होता, आदत पड़ चुकी है, लोहे को अगर बार-बार मारोगे तो लोहे पर असर नहीं होगा। उसकी सास रोती भी नहीं, चिल्लाती भी नहीं, मार खाती है और बस बात खत्म।
तीसरे दिन को पता चला कि पास के ही किसी गांव में एक स्त्री को दहेज के लिए जला दिया गया। कमाल की बात तो यह थी कि पुरुष तो पुरुष, गांव की बाकी महिलाओं को भी इससे कोई आपत्ति नहीं थी, उनका कहना था कि सही तो किया, दहेज नहीं दोगे तो क्या पूजेंगे? झेलम यह सब सुनकर अचरज में थी। 1 हफ्ते के बाद झेलम वापस आई। सुकून की सांस ली कि गुड़गांव का वातावरण अनुकूल है उसके लिए, उसके परिवार के लिए, उसके बच्चे के लिए जो अभी उसके पेट में है।

झेलम का बेटा हुआ और नाम दक्ष रखा गया। हर जगह खुशी और उल्लास का माहौल था, पहला ही बच्चा और वह भी लड़का! गांव में मिठाई बांटी गई। झेलम ने बहुत दुख देखे, पर अब वह हर दुख को भुला देती थी, अपने बेटे के साथ मानो उसकी एक नई शुरुआत हो रही थी, यह आरंभ था उसके नए जीवन का, मानो महादेव ने उसको एक नया जन्म दिया हो। अभी भी रूद्र उसको मारता था, प्रताड़ित करता था, पर दक्ष की शक्ल मानो उसकी हर एक चीज को भुला देती। उसने मंदिर जाना फिर शुरू किया।
अपने बेटे के अंदर वह हर गुण डालना चाहती थी जो वह अपने भाई में नहीं देख पाई, अपने पिता में नहीं देख पाई, अपने पति में नहीं देख पाई। उसको नारियों का सम्मान सिखाना चाहती थी, इंसान का सम्मान सिखाना चाहती थी, आगे बढ़ता हुआ एक अच्छा इंसान बनते हुए देखना चाहती थी। समाज के लिए कुछ करते हुए देखना चाहती थी, जो कहीं ना कहीं उसके बहुत ही अंदर घर कर चुका है, उसको तारा देवी की जगह देखना चाहती थी, अपनी मां की जगह देखना चाहती थी। 1971 में बांग्लादेश आजाद हो रहा था और तभी पता चला कि ससुर की मृत्यु हो गई, अब उसकी सास भी आज़ाद हो गई। पर केवल 4 सालों के लिए 1975 में उनकी भी मृत्यु हो गई, जैसे ही पूरे देश पर आपातकालीन लागू किया गया।

बहुत बार हुआ जब गली में बच्चे लड़ रहे होते तो दक्ष झगड़ा करके आता, माँ दक्ष को बहुत डांटती और रुद्र हमेशा झेलम को बदले में ही डांट देता। वही पुरानी बात “लड़के अगर मस्ती नहीं करेंगे तो और कौन करेगा?” झेलम अनंत प्रयास करती कि किसी भी प्रकार से सारी धारणाओं को बदल सकें पर उसके सारे प्रयास रुद्र के सामने विफल हो जाते है। अभी भी वह आवाज नहीं उठा सकी। उसका बेटा भी उसके पति की तरह निकलेगा, वह जान चुकी थी। बाहर खून खराबा करके आता और वह घर पर बैठी रोती बिलखती पर कुछ ना होता। पति डीएसपी बन गए थे और उन्होंने अपने बेटे को भी पुलिस में भर्ती करवा लिया उसकी शादी के लिए इश्तेहार भी छपे। झेलम के बस में होता तो वह किसी भी औरत को इस नर्क का भागीदार बनने से रोक देती। शादी हो गई। लड़की का नाम था नीलम जो दिल्ली के सरकारी स्कूल में पढ़ाती थी। शादी के बाद एक अलग ही प्रकार की चमक देखने को मिलती है। पर यह चमक इतनी देर बरकरार ही नहीं रही। दक्ष रुद्र का पुत्र तो था पर उसका विषैलापन रूद्र से कहीं ज्यादा था।

नीलम समझ चुकी थी कि उसकी शादी किसी सही इंसान के साथ नहीं हुई। पर वह नए युग की महिला थी अपनी बात को रखना जानती थी, और किसी भी प्रकार से दक्ष से दबती नहीं थी। झेलम यह देखकर खुश थी कि जो काम वह नहीं कर पाई है उसकी बहू कर रही है। दक्ष बहुत परेशान हो चुका था। उसके अभिमान को, उसके पुरुष तत्व को मानो ठेस पहुंच चुकी हो, एक बार उसने नीलम पर हाथ उठाया। उसको मारा पर मुद्दे की बात यह थी कि नीलम ने भी बदले में उसे मारा। पुरुष तत्व को ऐसा लहूलुहान किया कि दक्ष कभी शीशे में खुद को देख ही नहीं पाया। उसने ठान लिया था कि उसको नीलम से छुटकारा चाहिए पर तभी पता चला कि नीलम गर्भवती थी। दक्ष ने सारी कहानी रूद्र को बताई। रूद्र हैरान था। उसकी पत्नी में कभी हिम्मत नहीं हुई आवाज ऊँची करने की, और ये आज कल की नई युग की लड़कियां पता नहीं अपने आप को क्या समझती हैं। रूद्र ने अपने पुत्र को छुट्टी देकर उसको गांव में अपनी पत्नी के साथ रहना चालू करने को कहा, वहां पर उसको स्त्री होने के बारे में पता चलता। परिस्थिति गंभीर होती जा रही थी नीलम को जब-जब दबाने की चेष्टा की जाती, वो उतना ही उभर कर आती। वह एक सजग महिला थी, अबला नहीं थी। अब रूद्र को भी बात समझ में आ गई थी कि उसका बेटा नीलम से क्यों छुटकारा पाना चाहता है। दाई को बुलाया गया, यह बात निश्चित की गई कि जब भी जन्म दिया जाएगा तो नीलम के शरीर में जहर डाला जाए, ताकि ऐसा लगे कि जन्म देते वक्त उसकी मृत्यु हो गई। यदि लड़का हुआ तो लड़के को पाला जाएगा और लड़की हुई तो उसे भी मार दिया जाएगा। उनका हैंग कार उनके सर पर चढ़ चुका था।

जब झेलम को यह बात पता चली तो वो विद्रोह पर उतर आई। वह नीलम को बताने जा रही थी और इतनी देर में उसके सिर पर उसके बेटे ने प्रहार किया। उसको कमरे में बंद कर दिया गया तब तक के लिए जब तक उनका बच्चा बाहर ना आ जाए।
वही हुआ जिसका डर था लड़की हुई, और नीलम और उसकी लड़की को मार दिया गया। अर्थी उठाने के लिए नाटक करना था। सास के कमरे का दरवाजा खोला गया। झेलम को अच्छे तरीके से बताया गया कि अभी उसने कुछ किया तो उसे भी मार दिया जाएगा। झेलम ने सारे रीति रिवाज किए। श्मशान में भी गई अपनी बेटी समान बहू और अपनी पोती की चिता को भी जलाने के लिए। अग्नि को देखकर उसे एक कहानी याद आई जो उसके पिता उसे सुनाते थे, महादेव जब तपस्या में लीन थे तब कामदेव उनको परेशान कर रहे थे। बहुत बार हद पार कर दी, एक बार कामदेव ने सारी सीमा ही लांघ दी, महादेव को क्रोध आया। उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोला और उसमें से आग निकली, कामदेव उसी क्षण भस्म हो गए। प्रलय आ गई, सर्वनाश हुआ। अग्नि को देखकर झेलम को सर्वनाश होने का एहसास हो रहा था। अब वह सर्वनाश ही करना चाहती थी। उसी रात को उसने अपने घर में ताले जड़ दिए घर से बाहर निकली और घर को आग लगा दी। गांव के बीचो-बीच पूरा घर चल रहा था। उसने अपने पति और पुत्र को घर के अंदर ही रखा। उनकी चीख सुनकर उसे दया नहीं आ रही थी, उसे रोना भी नहीं आ रहा था, उसे प्रेम भी नहीं आ रहा था उसे कुछ संतुष्टि मिल रही थी, अधूरी से संतुष्टि, खाली से संतुष्टि। आग लगाते वक्त वह इतनी क्रोधित हो गई कि उसने पूरे गांव को दोषी ठहराया, मानो उसमें काली की आत्मा आ गई हो, उसने पूरे गांव को आग लगाने का निर्णय लिया। लोग रोकना चाहते थे, पर भयभीत थे, आखिर उसके हाथ में जली हुई लकड़ें थी, बाल भयंकर रूप से खुले हुए, चेहरे पर अलग प्रकार की निर्भीकता, हाथों पर कालक, जो भी देखता एक पल के लिए सन्न सा रह जाता। झेलम उफान पर थी। साथ वाला घर, साथ के साथ वाला घर और उसके साथ के साथ वाला घर को आग लगाते जा रही थी। रात्रि एक बजे पूरे गांव में दहशत मच गई, मुखिया जी आए उन्होंने अपनी बंदूक उठाई और झेलम को मार गिराया।
गांव के सारे लोग सुरक्षित थे। मरे थे तो रूद्र और दक्ष। अगले दिन अखबार में खबरें छपी, “भारत में नई अर्थव्यवस्था की शुरुआत-एलपीजी, अब मिलेगी अर्थव्यवस्था में भी आजादी”, “एक पागल महिला ने लगाई पूरे गांव में आग-मौत” और “सोमवार के दिन महादेव के मंदिर में देखी गई भक्तों की भीड़।”

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