एक अलग दुनिया है,
झरोखे के उस पार,
जो मेरी दुनिया से बहुत अलग है।

एक कांच के उस पार,
तो एक इस पार।

कभी कभी मैं उड़ना चाहती हूं,
एक ऊंची छलांग भर कर,
कहीं निकल जाना चाहती हूं।

एक कदम हवा में,
तो एक कमरे के फर्श पर।

लेकिन एक डर सा भी तो है,
एक ख़्वाब को दबाता हुआ सा,
एक डर भी तो है ना।

एक बड़ा ख़्वाब अनंत में,
एक छोटा डर मन में।

अब दोनो कदम खिड़की के बाहर,
बस कुछ थोड़ा सा बंद है अब,
कुछ पुर्जे मेरे अस्तित्व के।

एक दिल करता है उड़ जाऊं अब मैं,
एक ज़हन कहता है मुड़ कर वहीं रह जाऊं
मैं।

आंखें मूंद कर किनारे पर आ खड़ी हूं अब,
दिल की धड़कन का शोर ज़हन की बंदिशों
से बड़ा है,
किंकर्तव्यविमूढ़ हूं शायद।

एक, दो, तीन,
उड़ने का वक्त आ गया।

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