कुछ तो है तुझमें जो खोया सा है,
जाग, और जगा उसे जो कहीं सोया सा है।

बांध हर नदी पर तूने ही तो बनाया है,
जाल खुद के लिए तूने ही तो बिछाया है।

कुछ गलत सुन कर तू आज भी चुप क्यों है?
दिल में अगर रोशनी है तो बाहर अंधेरा घुप क्यों है?

चीख इतनी ऊंची है फ़िर भी अनसुनी क्यों है?
बिन सोचे ये राहें तूने चुनी क्यों हैं?

क्या है हिम्मत तुझमें रुक कर मुड़ने की?
या सोची है उम्र भर बिना विचारे भेेड़ चाल चलने की?

हर बार सही नहीं होता यूं चलते चले जाना,
कभी मुड़ कर, राह छोड़ कर बस रुक जाना

एक बार गलत राह चुन ली भी तो क्या?
एक बार किसी और की सुन ली भी तो क्या?

गलतियां तेरी गिन कौन रहा है?
क्यों  तू कब से यूं मौन रहा है?

बहुत हुआ, चल अब कदम उठा,
मना उसे जो अब भी है रूठा,

बढ़ा हाथ और कुछ बदल कर दिखा,
जो सोए हैं अब भी उन्हें कुछ सिखा।

कुछ तो है उसमें जो खोया-सा है,
जाग और जगा उसे जो आज भी सोया सा है।

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Photo Courtesy : https://www.instagram.com/p_paradox07/