घर में कैद हूं मैं,
बहुत दिनों से चार दिवारी में हूं।
ना दस्तक होती है,
ना किवाड़ खुलते हैं।
ये मकान है तो वैसा ही,
पर ये घर, घर-सा नहीं है।

वही बिस्तर है,
और वही हैं सिरहाने,
ना मेरी अलमारी बदली है,
और ना फर्श पर पड़े उसके निशान।
पर ये घर, घर-सा नहीं है।

हर कमरे में वही तस्वीरें हैं,
वही किताबें शेल्फों पर लगी हुई,
टूटे से फूलदान में उगता एक पौधा,
और क्यारी में उग रही सब्जियां।
सब तो वैसा ही है,
पर ये घर, घर- सा नहीं है।

मेरे स्कूल के रिबन अब भी दराज़ में हैं,
और वैसे ही पड़ी है मेरी डायरी,
जिसमे सैकड़ों बार मैंने लिखने की कोशिश की,
लेकिन लिख ना पाई।
पर ये घर, घर- सा नहीं है।

सब तो यहीं पर है,
फिर कैसी असमंजस में उलझा है मेरा ये मन,
सब जान कर इतनी बेचैन क्यों हूं मैं,
क्यों मैं घोंसले में लौट कर भी बेघर सा महसूस कर रही हूं?

बहुत सवाल हैं।
जवाब पूछने पर भी नहीं मिलते।
दौड़ रही हूं,
ना जाने कहां।
किसी ची़ज से टकरा कर गिर पड़ी,
आंखें खुली तो सब एक सपना था।
घर कहां है?

घर कभी था भी क्या?
या एक मृगतृष्णा है?
महज़ एक कल्पना है,
एक एहसास है।

जानती भी नहीं सवाल है या जवाब है,
बैठ चुकी हूं अब हार कर,
इस मकान में तो हूं,
पर ये घर, घर-सा नहीं है।

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