” अरे ! मेरे साथ रहेगा तो बहुत कुछ सीखने को मिलेगा! हमेशा सिखाता रहूंगा ।” अनंत बिलाल की ये बात सोचकर मन ही मन मुस्कुराने लगा ।
“कितना मजाकिया था वो, छोटी छोटी बातों पर बस मुस्कुरा दिया करता था” उसने सोचा। अनंत ने आंखे खोल कर वापस देखा तो वास्तविकता में आया। पूरे घर में शोक का माहौल था, बिलाल अब इस दुनिया में नहीं था ।

प्रिय पड़ोसी बिलाल की मौत होने पर अनंत उनके घर तो गया, मगर केवल वापसी के इंतजार में । यूं नहीं था कि उसे दुख नहीं था, पर उसने दोस्त को आख़िरी श्रद्धांजलि देने के लिए छुट्टी ली थी मगर काम ज़्यादा होने की वजह से उसे घर से ही कुछ कार्य शाम तक खत्म करने के लिए दिया गया था।

” काफ़ी समय लग रहा है। काम बहुत है, समझ नहीं आता पूरा कैसे होगा! अभी तो शायद २ घंटे और लग जाएं।” अनंत सोचने लगा ।

उसका ध्यान फिर से अपने दोस्त के मृत शरीर पर पड़ा। बिलाल की मां और पत्नी शरीर के पास ही बैठ कर रो रही थीं। पिता जी एक कोने में खड़े होकर सिसक रहे थे। जवान बेटे की मौत का किसको दुख नहीं! पर मर्द होना आसान भी कहां है, हर चीज़ को मर्यादा में रखना पड़ता है। फिर चाहे वो अपने पुत्र की मौत पर उभरे आंसू ही क्यों ना हो!

बिलाल का तीस साल की उम्र में ही देहांत हो गया। जिस पुलिसवाले ने इसकी सूचना दी उसने कहा कि शरीर को पास के चौराहे से एक सड़क हादसे से बरामद किया गया ।

अनंत फिर से अपने औफिस के काम को लेकर सोच में पड़ गया। दिमाग में कुछ परिकल्पना की तो पाया कि अगर वो अभी घर के लिए ना निकला तो काफ़ी देर हो जाएगी। वो काम को लेकर किसी प्रकार का जोख़िम नहीं लेना चाहता था, प्रोमोशन उसका इंतज़ार कर रही थी। जिन कंधो को जनाजे के नीचे होना चाहिए था, वो अब केवल कुछ लालसाओं के नीचे दबे थे। और लालसा ज़िम्मेदारियों या भावनाओं की मोहताज नहीं होती, वह सिर्फ फायदे पर नजर टिकाए रखती है । अनंत ने पिता जी को कंधे पर हाथ रख कर सांत्वना दी, और अपने घर की ओर चल दिया।

” काफ़ी बुरा हुआ अनंत के साथ, ऐसा किसी के साथ ना हो!” रास्ते में चलते हुए अनंत खुद में बुडबुडाने लगा।
विडंबना है कि जानते हुए भी कि मृत्यु ही सत्य है, जीवन नामक प्रक्रिया का ही दूसरा अध्याय है, हमें लगता है कि ऐसा हमारे साथ कभी नहीं होगा । बहुत से निधन देखने के बाद , बहुत सी लाशें देखने के बाद भी हमें एहसास नहीं होता कि हमारा अंत भी यही है। यद्यपि मृत्यु हमें भी आएगी और अगला जनाजा हमारा भी हो सकता है।

खैर, अनंत मौत को लेकर काफी सोच में पड़ गया। एक तरफ से उसे काम की भी चिंता हो रही थी। लेकिन कुछ तो था जो उसे सोचने पर मजबूर कर रहा था।

उसने कदम आगे रखा ही था कि वो अचानक से मुंह के बल गिर पड़ा। बचने के चक्कर में उसने अपने हाथ भी पैने पत्थर पर दे मारे। दर्द तो था मगर अनंत को उठते ही एहसास हुआ कि किस प्रकार मनुष्य कभी बल से, कभी छल, कभी पैसों से खुद को मौत से बचाने की तमाम कोशिशें करता है, कभी वेंटिलेटर पर, कभी तपस्या से, कभी दवाइयों से.. मगर अंत तो तय ही है। जब इन हाथों से भी संभला नहीं जाता, तो आदमी और भी पीड़ा में मुंह के बल गिरता है। मौत आती है। आएगी ।

अनंत को लग रहा था मानो बिलाल खुद , आज भी उसे ये सब सिखा रहा था! यूं तो बिलाल हमेशा से ही अनंत को बहुत चीज़ें सिखाता था मगर आज उसकी मौत भी एक पाठ बनकर अनंत के सामने खड़ी हो गई थी।

सामने वाली बर्फीली चोटी पर सूर्य की किरणे मानो जादू बिखेर रही थी। दो मिनट के लिए वो बीच रास्ते में पूरा स्थिर हो गया। अनंत यूं वादियों में खो सा गया था । उसे लगा मानो वो किरणे उसके लिए ही बिछाई गई थी। हर वक़्त व्यस्त होने के कारण उसने ज़िन्दगी की छोटी छोटी खुशियों को प्रोमोशन और पैसों से बदल लिया था।

अचानक से दर्द भरी आवाज़ आई ” साहब साहब! पैसा नहीं मांग रहे । कुछ खाने को दिला दो ना”। करीब अनंत की ही उम्र का एक दुबला कमजोर आदमी अपनी लंगड़ी बहन को पीठ में उठाए भीख मांग रहा था। अनंत ने कुछ देखा ना जाना, उसे दिखा तो केवल एक अति दुर्बल शरीर । उसके ज़हन में एक बात आई और मुंह सफेद पड़ने लगा। अनंत को एहसास हुआ था कि उसका अपना शरीर असल मायने में उसका है ही नहीं । ये शरीर तो पोषणता से बना है। खाने से बना है। उसका इसपर क्या हक? अनंत ने जाना कि वो केवल मांस का लोथड़ा है, जिस्म केवल बाहरी नुमाइश है। पोषण के बिना कोई शरीर नहीं हो सकता ।

ये बात सोचते ही अनंत ने अपने दिमाग से बाहर निकाल दी। काफ़ी आकुल कर देने वाला विचार था। वह अपना बरसों का भ्रम नहीं तोड़ना चाहता था। आज ना जाने क्या बात थी, हर कदम पर अनंत को ज़िंदगी मानो आइना दिखा रही हो। उसे खुशी थी कि वो अलग चेहरे देख रहा था मगर ये सब सत्य उतना ही भयानक भी था।

अनंत घर पहुंचा तो मानवी ने उसे नए कपड़े दिए और नहाने के लिए भेज दिया। मानवी अंनत से तीन साल पहले मिली थी, दोनों ने ही एक साल बाद शादी कर ली थी।

” इतना काम है ! दोस्त के शोक में भी शामिल ना हो पाया। ये ज़िन्दगी सुधरती क्यों नहीं! इससे अच्छा तो मर जाना है” अनंत के मुंह से जाने अनजाने में निकाल गया।
” हाय मरे तुम्हारे दुश्मन! ” मानवी उसके मुंह पर हाथ रख कर बोली।

अनंत को फिर एहसास हुआ कि कैसे इंसान ने मौत के डर का कारोबार शुरू किया। न जाने प्राचीन काल में कब वो समय आया था कि उसके धर्म में आस्था से देखी गई मौत को किसी बुरे एहसास में बदल दिया गया । हमेशा से आशीर्वाद “आयुष्मान भव:” “जीते रहो” दिया जाता रहा। हमें लगता रहा कि ज़िन्दगी ही सबकुछ है। मौत का नाम लेने पर ही घर में मां से दांट पड़ जाती थी। बचपन से हमें मृत्यु से केवल बचना सिखाया गया है । ज़िन्दगी को मौत के बगैर जानना तो केवल अनपढ़ता की क्रिया है । अगर हमें कोई कह दे कि मौत के आगे का सफर बहुत सुखद है, तो हम क्यों मौत से डरेंगे? हम मौत से केवल उसकी अनिश्चितता की वजह से भयभीत हैं। जिस दिन हमें एहसास हो जाएगा कि मौत भी ज़िन्दगी जितनी ही खूबसूरत है या उससे भी ज़्यादा, तो हम मौत की तरफ आंख उठकर देखेंगे, झुकाकर नहीं।

“बातें करना आसान है, यह सब सिर्फ कहने सुनने के लिए अच्छी हैं।असल में मौत कौन सी खूबसूरत है?” वह विचारों की उपेक्षा करके उन्हें दिमाग से निकालने की कोशिश करने लगा।

अनंत ने इन सब बातों से ध्यान हटाकर, ऑफिस का लैपटॉप खोला । कंपनी की साइट पर पहले ही पेज पर उसके संस्थापक की तस्वीर लगी थी। जल्दी में कभी ध्यान उसपर ध्यान नहीं दिया गया था। तस्वीर के नीचे लिखा था ” अनंत सूद (1889-1945 )”। दो मिनट के लिए अनंत बौखला गया। ये कैसा संजोग है? आज ही के दिन क्यों?

” अनंत का अर्थ होता है जिसका अंत नहीं, तो फिर अनंत कैसे मर सकता है !!!!” वह हड़बड़ाहट में कुछ भी कहने लगा।

हारकर तथ्यो और भटकते विचारों को उसने स्वीकार कर ही लिया।

“मौत आनी ही है, आएगी।”

अनंत की भ्रम की दुनिया जैसे एकाएक बिखर गई। इस दिन उसके रोभ का , उसकी इच्छाओं का, उसकी लालसा का अंत हो गया।
मानो जिस जिस्म, विचारों में वो अपनी शान ढूंढ़ता आया है, सब भस्म हो गया। जब हमें लगता है कि आम ज़िन्दगी से परे एक बहुत शक्तिशाली दुनिया हमारा इंतज़ार कर रही है, तभी होता है अनंत का अंत।

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